बचपन की सुनहरी यादें
काव्य साहित्य | कविता अभिषेक मिश्रा15 Nov 2025 (अंक: 288, द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)
(बाल दिवस विशेष)
बाल दिवस आया है, फिर से शोर मचाने को,
इस उम्र ने झकझोरा है, कुछ पीछे लौट जाने को।
वो दिन जब हम छोटे थे, ख़्वाब बड़े सजाते थे,
हर पल था हँसी भरा, जो अब बस यादें लाते हैं।
वो मिट्टी की गुल्लक, जिसमें सपने झनकते थे,
वो काग़ज़ की नावें, जो बारिश में तैराते थे।
वो टूटा हुआ बल्ला, जिससे क्रिकेट खेलते थे,
और अम्मा की डाँट में भी, हम हँसकर मिलते थे।
न फोन था, न इंटरनेट, न कोई अजब कहानी थी,
बस दोस्तों की टोली, और मासूम सी जवानी थी।
वो स्कूल का बस्ता, जो कंधों को झुकाता था,
पर टीचर के आते ही, हर शोर रुक जाता था।
आज सोचा तो याद आया, वो आमों का बाग़ कहाँ,
वो गेंद जो छत पर थी, अब तक लौटी या नहीं भला।
वो दादी की कहानियाँ, वो गर्मी की रातें,
जहाँ परियाँ मुस्कुरातीं, और चाँद सुनाता बातें।
सच कहूँ, वो दिन रेशम से भी मुलायम थे,
जब हर छोटी ख़ुशी में सपने सलामत थे।
अब बड़े होकर थक गए, इस दौड़ती ज़िंदगी से,
काश! फिर मिल जाएँ वो दिन, उस टूटी गुल्लक से।
मैं अभिषेक, आज भी उस नन्हे ख़ुद को ढूँढ़ता हूँ,
जो धूल में भी हँसता था, और हर चोट पर झूमता था।
कभी काग़ज़ की नावों में, कभी पेड़ों की छाँवों में,
वो बचपन की ख़ुश्बू, अब भी दिल की गलियों में।
कभी कक्षा की खिड़की से, सपनों को ताकता हूँ,
कभी नेहरू चाचा की बातों में, बचपन को तराशता हूँ।
वो दिन थे सच्चे, वो पल थे बड़े सुनहरे,
जो आज की भीड़ में, सबसे प्यारे और गहरे।
अब यादों में खोने से बढ़कर, भविष्य सँवारना है,
हर बच्चे के चेहरे पर, मुस्कान उतारना है।
ए दुनिया! तू धीरे चल, इन कलियों को खिलने दे,
ये देश के सपने हैं, इन्हें उम्मीद से मिलने दे।
बाल दिवस की बधाई हो, हर बच्चा अभिमान हो,
हर घर में हँसी की गूँज, हर दिल में आसमान हो।
कवि अभिषेक कहता है:
“बचपन लौट नहीं सकता, पर उसकी ख़ुश्बू साथ है,
जो दिल में बच्चा ज़िंदा रखे, वही सच्चा इंसान है।”
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