गणतंत्र का नया व्याकरण
काव्य साहित्य | कविता अभिषेक मिश्रा1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
न मैं शब्दों का सौदागर, न मैं कोई नेता हूँ,
मैं सदियों की ख़ामोशी का, गहरा सन्नाटा हूँ।
मैं वो पन्ना हूँ संविधान का, जो अब तक अधूरा है,
मैं वो सपना हूँ आज़ादी का, जो न आधा न पूरा है।
तुम जश्न मनाते ऊँचाई पर, मैं नींव की ईंटें ढोता हूँ,
तुम फहराते हो झंडा, मैं उम्मीदें लेकर बोता हूँ।
गणतंत्र तभी गरजेगा जब, कोई द्वार अँधेरे में न हो,
इन्साफ़ की पावन राहों में, कोई रुकावट घेरे में न हो।
अब इतिहास के बासी पन्नों पर, मैं स्याही नहीं बहाऊँगा,
मैं वर्तमान की मुट्ठी में, अपना भविष्य सजाऊँगा।
यही भविष्य अब भारत की, नई परिभाषा लिखेगा,
नभ की हर एक ऊँचाई पर, अब मेरा तिरंगा दिखेगा!
मेरा तिरंगा अब सिर्फ़ अम्बर का, शृंगार नहीं कहलाता,
ये महाशक्ति बन चुके भारत का, ‘विजय-पत्र’ है कहलाता।
केसरिया अब शौर्य की सीमा, तोड़ आगे बढ़ जाता है,
सफ़ेद अब ‘शांति-शक्ति’ का, नया व्याकरण सिखाता है।
हरा अब महज़ हरियाली नहीं, ‘आत्मनिर्भर’ का वादा है,
और चक्र की ये चौबीस तीलियाँ, ‘विश्व-गुरु’ का इरादा है!
जहाँ ‘डिजिटल’ और ‘धर्म’ का, अद्भुत संगम देखा जाता,
वहाँ भारत की सामर्थ्य का, अब नया अध्याय लिखा जाता।
कल तक जो महज़ एक बाज़ार था,
आज वो ‘नवाचार’ है, मेरा युवा अब ‘स्टार्टअप’ से,
करता सपनों का सत्कार है।
अब सिर्फ़ खेतों की मिट्टी नहीं, अंतरिक्ष की धूल उड़ाते हैं,
हम वो भारत हैं जो ‘संकट’ में भी, ‘अवसर’ खोज लाते हैं।
मैं नया दौर, मैं नया लहू, मैं नई आग का नाम हूँ,
मैं कल का उजला सूरज, और आज का इंक़िलाब हूँ।
मैं भूल नहीं दोहराऊँगा, मैं ख़ुद मशाल बन जाऊँगा,
मैं मिट्टी का क़र्ज़ चुकाकर, असली हिन्दुस्तानी कहलाऊँगा।
मैं रुकूँगा नहीं, मैं थकूँगा नहीं, मैं सत्य का एक सिपाही हूँ,
मैं अपने वतन की बदलती मिट्टी की, लिखी हुई गवाही हूँ।
मेरी रग-रग में दौड़ रहा, मेरे पूर्वजों का ‘मान’ है,
मेरा हर शब्द अब भारत की, ‘जीत’ का नया अभियान है!
मैं हर अधूरे पन्ने पर, अब ‘विजय-गाथा’ लिख जाऊँगा,
मैं जीऊँ तो वतन के लिए, और वतन के लिए ही मिट जाऊँगा।
इन्हीं लफ़्ज़ों के साथ अब, मैं अपनी क़लम को रोकता हूँ,
मैं इस वतन की पावन मिट्टी को, सौ बार सलामी ठोकता हूँ!
जय हिन्द! जय भारत!
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