बंद है नज़र
शायरी | नज़्म डॉ. अंकेश अनन्त पाण्डेय15 Mar 2026 (अंक: 294, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
हर ओर धुआँ है,
बंद है नज़र
पर दिख रहा सब है,
है बहुत शोर
हमारी बस्ती में,
पर ख़ामोश हर लब है
आज सबको है,
जो तलब,
वो तो ज़हर है!
होना चाहे अब एक गाँव
इसी आरज़ू में हर शहर है!
नींद के आग़ोश में
दिन हैं,
रातें जगी हुई हैं!
सफ़र की ज़रूरत है मुसाफ़िर,
नदी की तलाश में समंदर है!
एक वफ़ा ही तो कम उम्र है,
बिक रहा हर घड़ी सब्र,
उस अदालत को कभी न्याय मिले,
हज़ारों झूठ पर एक सच का क़र्ज़ है!
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