घनन घनन घंटा बाजे . . .
आलेख | चिन्तन विशाल शुक्ल1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
स्वतंत्रता के बाद से हमारे देश के हाल बेहाल है। इसके बावजूद कई स्वार्थी नुमाइंदे देश को हलाल और अलाल कर उसकी अर्थी निकालने में तुले हुए है। देश की यह दशा देखकर हमारे शहीद भी व्यथित मन से सोच रहे होंगे कि . . . “आख़िर! इतनी जल्दी भी क्या थी? देश को स्वतंत्र कराने की।" वैसे भी देश शंकर जी के नाम से खुल्ले ‘सांड’ की तरह हमारा देश स्वतंत्र मदमस्त चल रहा है, जहाँ हर ज़िन्दा लाश कैलाश बनकर खोखली व्यवस्था के घंटनाद पर मनमोहक नृत्य कर रही है।
हालाँकि घंटनाद (घंटे की ध्वनि) को ध्यान की एक पवित्र ध्वनि माना जाता है पर ठीक इसके विपरीत घटिया राजनीति की पराकाष्ठा पर जब यह ख़तरे का सूचक बनकर घनघनाती है तो लोकतंत्र की साँसें घंटे पर ही अटक जाती हैं। ‘घंटा’, समय और काल का भी संकेतक है, किसी का जब अंत समय आता है तो बातों ही बातों में कहा जाता है कि “यह घंटे भर का मेहमान है” वर्तमान में ‘घंटे’ पर चल रहे बेहूदा राजनीति के हास्य और दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंग का अंजाम कितना बुरा होगा यह अभी से नज़र आने लगा है। फलस्वरूप फूहड़ राजनीति के अंत का ख़तरा-जनक सूचक ‘घंटा’ बजना चालू हो गया है।
हमारी पुलिस भी इस समय अपराधियों को पकड़ने की जगह ‘घंटा’ पकड़ने में लगी है, और घंटा है कि मंदिरों से निकलकर विधानसभा और संसद तक जाने की तैयारी में है।
एक समय वह भी था जब घंटा अनुशासन पालन का यंत्र हुआ करता था, जिसके बजते ही लोग अपने कार्य का प्रारंभ और अंत कर देते थे, लेकिन . . . अब यही घंटा आज राजनीति का काम तमाम करने पर तुला हुआ है, और करे भी क्यों ना? आप जानते हैं? घर और मंदिरों में हाथ से बजाई जाने वाली घंटी को गरुड़ घंटी कहते हैं, उसमें गरुड़ अंकित होते हैं। गरुड़ का स्वभाव विषैले सर्पों को दमन करने वाला होता है फिर चाहे वह सर्प राजनीति के हो या जंगल के।
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