ईश्वर
काव्य साहित्य | कविता विशाल शुक्ल1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
समंदर खारा है
अपनों से हारा है।
यहाँ कोई नहीं अपना
सब मेरा और तुम्हारा है॥
अलग है नैन हमारे
पर नयनों का जल खारा है।
जीवन और मौत के खेल में
हर कोई यहाँ बेचारा है॥
मृग तृष्णा खींचे सबको
मन तो विचारों का पिटारा है।
सबके रंग अलग अलग पर
हर शख़्स बेबसी का मारा है॥
सूरज, चाँद, तारे सुंदर
धरती, गगन ये संसार सारा है।
सबका धर्म अलग अलग
पर ईश्वर एक हमारा है॥
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