इंसान इन दिनों . . .
शायरी | नज़्म अश्वनी कुमार 'जतन’15 Apr 2026 (अंक: 295, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
आदमी के ज़ेहन से, इंसानियत काफ़ूर है
राह पर इसको ले आना, आपका दस्तूर है
देख के मुश्किल में दूजे को, इसे आता मज़ा
क्या करे इंसान, आदत से भी तो मजबूर है
चीज़ें इकट्ठी कर रहा, जैसे फ़ना होना नहीं
इसके लहजे से है लगता, ये बड़ा मग़रूर है
हम रवैय्ये की करें, गर बात इस इंसान की
ये हक़ीक़त से जहाँ की, आज कोसों दूर है
गर तसल्ली से किसी, बन्दे से हम चर्चा करें
हादसों से ज़िन्दगी, हर शख़्स की मामूर है
बात मसलों पर किये बिन, राय अपनी दे रहा
दिख रहा पत्थर ‘जतन’, अंदर से बिलकुल चूर है
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