मैं और मेरा घर
शायरी | नज़्म महेश पुष्पद15 May 2019
सदियों से तनहा है, वीरान सा रहता है,
मेरा घर मुझसे अक़्सर ये कहता है।
दोनों ही महरूम हैं परवाह करने वालों से,
दोनों ही परेशां हैं ज़िन्दगी के सवालों से।
मेरी और मेरे घर की कहानी एक सी है,
उसका बुढ़ापा और मेरी जवानी एक सी है।
टूटे हैं दोनों ही, कोई मरम्मत नहीं करता,
शायद कोई अपना भी हमसे, मुहब्बत नहीं करता।
कबेलू टूट चुके, लकड़ियाँ भी सड़ गई,
मेरे दर्द की कहानी भी, इस हद तक बढ़ गई।
रहता है ख़ामोश किसी से, गुफ़्तगू नहीं करता,
दास्तान-ए-दर्द को रूबरू नहीं करता।
हो चुका जर्जर बहुत, हर कोना कच्चा है,
मानों बिछड़कर रो रहा, अपनों से कोई बच्चा है।
मुद्दत से त्यौहार कोई मनाया नहीं हमने,
ज़िन्दगी का गीत अब तक गाया नहीं हमने।
एक अरसे से रहे, एक दूसरे से हम जुदा,
तू भी तनहा मैं भी तनहा, हम दोनों ही ग़मज़दा।
सूना है तेरा आँगन, किसी ने सजाया नहीं है,
मैं रूठा हूँ कई दिनों से, किसी ने मनाया नहीं है।
मेरी ज़िन्दगी, और तेरी, दीवारें बेरंग हैं,
बाक़ी रहा न उल्लास कोई, न कोई उमंग है।
पतझड़ के सूखे पेड़ से हालात हमारे हैं,
गुज़रे न किसी और पर, जो दिन हमने गुज़ारे हैं।
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टिप्पणियाँ
Mahesh Pushpad 2019/05/31 02:24 AM
Thanks to all of you, kabhi kabhi likh deta hun Controll nhi hota.
Saim 2019/05/19 02:51 PM
Dil se nikli kavita
Rohit Yadav 2019/05/19 04:56 AM
अति सुंदर महेश जी
Vivek 2019/05/19 03:57 AM
It's awesome sir,bhaut mast hai.
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Palak RATHORE 2026/04/21 03:35 PM
"आदरणीय सर, आपकी कविता पढ़कर दिल को जो सुकून मिला, उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। आपने न केवल शब्दों को पिरोया है, बल्कि अपनी अनुभवी दृष्टि से जीवन के गहरे अर्थ समझा दिए हैं। आपकी लेखनी में वो जादू है जो सीधे रूह तक पहुँचता है। ऐसी बेहतरीन रचना के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।"