रावण-दहन
काव्य साहित्य | कविता हनुमान गोप15 Jul 2021 (अंक: 185, द्वितीय, 2021 में प्रकाशित)
रावण-दहन कर लोग जब मुस्काए,
स्वर्ग में बैठे दशानन बहुत अकुलाए।
मन में कुछ विचार कर, धरा पर आए,
भय के बादल वसुधा पर छाए।
अफ़रा-तफ़री मची, बुरा हाल हुआ,
लगा जैसे प्रकट स्वयं काल हुआ।
बोले दशानन, घबराने की बात नहीं,
कहने आया हूँ तुमसे, जो बात सही ।
में पुलत्स्य ऋषि का वंशज,
विश्रवा का पुत्र, बड़ा ज्ञानी ।
मैं लंका का विजयी शासक
शक्ति मेरी, सुरपति ने मानी।
सहस्त्रबाहु से योद्धा मुझसे हारे,
रण में कई नरपति भी मैंने मारे।
मुझसे भय खाते थे ग्रह ओ नक्षत्र,
मेरे तरकश में थे सब दिव्य अस्त्र।
मैंने परिश्रम से शक्ति पाई,
रुद्र की कृपा और भक्ति पाई।
शास्त्रों को पढ़ा, अध्ययन किया,
शिक्षा को गुरु से भी ग्रहण किया।
मैं सब वेदों का पंडित ज्ञानी,
इस कारण थोड़ा अभिमानी।
कैलाश पर्वत था मैंने उठाया,
रुद्र को भी भुजबल दिखलाया।
शिव ने भी मुझको अपनाया,
शीश काटकर उनको चढ़ाया।
रूठे जब शंकर, मैंने मनाया,
शिव स्त्रोत रच, उनको सुनाया।
में रुद्र वीणा का भी वादक,
संन्यासी हूँ मैं और हूँ साधक।
मैंने आयुर्वेद के भी सूत्र पढ़े,
अर्क प्रकाश से उत्तम ग्रंथ गढ़े।
सीता हरण, जो मेरा दोष था,
वो इक भाई का प्रतिशोध था।
उसका दंड भी मैंने था पाया,
रण में सब कुछ अपना लुटाया।
तुम जो हर वर्ष, पुतले मेरे जलाते हो,
मुझको रावण, ख़ुद को राम बताते हो।
क्या इतना सहज है राम बन पाना?
राजा होकर वन में जीवन बिताना?
मेरे पुतले जलाकर होगा कुछ लाभ नहीं,
राम मिलेंगे जब मन में हो पाप नहीं।
विचार करो, कुछ ऐसा जतन करो
मन के भीतर जो रावण बैठा,
पहले तुम उसका दहन करो।
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टिप्पणियाँ
राजनन्दन सिंह 2021/07/07 08:40 AM
सुंदर एवं साहसी कविता। बहुत अच्छी ।
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Ritu Khare 2021/11/13 01:39 AM
Such out of the box poems are necessary for the growth of human mind. Congratulations on this one!