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आख़िर इंसान क्या करे?

दुख से भरा हुआ यह जीवन,
लगते समान बैरी और प्रीतम।
भाई भाई रोटी के लिए लड़ते,
मासूम बच्चे ग़रीबी में सड़ते।
इन घावों को कोई मरहम क्या भरे,
ऐसी हालत में आख़िर इंसान क्या करे?
 
आज मनुष्य जीता नहीं जलता है,
एक बार नहीं बार बार मरता है ।
पीड़ा और दुख से भरी है कहानी,
मजबूर है बचपन, मजबूर है जवानी।
कोई क्या होगा इन सब से परे,
ऐसी हालत में आख़िर इंसान क्या करे?
 
ईश्वर का भी खेल निराला,
धन और रिश्तों का मेल निराला।
धन की डोर से बँधा रिश्तों का प्यार है,
संसार कुछ और नहीं बस पैसे का यार है।
कितने इस बंधन में फँस मरे,
ऐसी हालत में आख़िर इंसान क्या करे?
 
आँखो के सामने अँधेरा लक्ष्य भी दूर हुआ,
भविष्य की चिंता में वर्तमान भी चूर हुआ।
दसों दिशाओं में है निराशा ही निराशा,
आँख मिचौली खेल रहा कैसा है यह विधाता।
इस जग में कोई क्या जिए क्या मारे,
ऐसी हालत में आख़िर इंसान क्या करे?

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