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स्त्री से पूछा

स्त्री, ओ! स्त्री
सुन पाती हो या 
श्रवणेन्द्रिय ने भी धोखा दे डाला
बाक़ी इंद्रियों की तरह सुन्न हो गई
पता है किसी को या किसी
को परवाह नहीं, अनसुना कर डाला। 
 
ओ! स्त्री ज़रा देखो तो, 
कितनी सुंदर क्यारियाँ हैं
अरे आँख भी थकी हुई
बोझिल धुँधले पड़ते हुए
क्या यह भी सन्न होने की तैयारियाँ है। 
 
ओ! स्त्री महसूस करो, 
इस नए उमड़ते मेघों को, 
अब महसूस करना बंद है
क्यों? तुम क्या जड़वत हो? 
नहीं तुम्हारे पास ठहरने के लम्हे चंद हैं। 
  
ओ! स्त्री मुझे बताओगी
कब तक यह शिथिलता रहेगी? 
हे दूजी नारी समय आने दो, 
इस प्रश्न का हल समय है
सही जगह जाने पर उत्तर पाओगी। 
 
ओ! स्त्री क्या तुम मरने वाली हो
नहीं, स्त्रियाँ कहाँ मरती हैं आसानी से, 
स्त्री को तो लोग बिल्ली कहते हैं
है भी जूठन पर पलने वाली
मत सुनो तुम इतनी हैरानी से। 
 
ओ! स्त्री सुनो ना, 
लड़कियाँ मरी जाती हैं
यह संसार कुछ अजीब है
ख़ुद एक बेटी, बहन, पत्नी, माँ होकर
भी दूसरे से बेटा चाहती हैं। 
 
ओ! स्त्री ज़रा बताओगी, 
नारी नारी की दुश्मन बनी
यह क्या खेल विचित्र चला
किस तरह कन्या होने से रोके
हर स्त्री की उलझन बनी। 
 
ओ! स्त्री चलो स्त्री
हम सब मिलकर चलते हैं
क़दम उठाते हैं विरुद्ध विधाता के, 
मैं, तुम, आस-पास की हम जैसी
एक नया इतिहास गढ़ते हैं। 

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