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जन्मदिन का तोहफ़ा

मेरे प्यारे साथियो! आपको कहानियाँ पढ़ना और सुनना अच्छा लगता है, और मुझे कहानियाँ लिखने में बड़ा मज़ा आता है। तो तैयार हो जाइए, क्योंकि आज की कहानी में तो हम दोनों को और भी ज़्यादा मज़ा आने वाला है। जानते हैं, क्यों? क्योंकि आज की कहानी एक बड़ी प्यारी-सी लड़की के बारे में है। जितनी प्यारी लड़की थी, नाम भी उतना-ही प्यारा था। स्वाति! यही कोई दस साल की थी वह। अब अगर आप यह पूछें कि स्वाति में ऐसा क्या था जिससे वह बड़ी प्यारी लगती थी, तो देखने में तो उसमें ऐसा ख़ास कुछ भी नहीं था। न वो दुबली थी, न मोटी; न लम्बी थी, न छोटी; न काली थी, न गोरी – लेकिन फिर भी बड़ी प्यारी लगती थी। ऐसी, कि अगर आपके पास बैठ जाए, तो आप भी उससे बात किए बग़ैर न रहें। अब ऐसा थोड़े ही होता है कि हर सुन्दर बच्चा प्यारा लगे, और बाक़ी बच्चे प्यारे नहीं लगें। है, न? हम दरअसल उन्हें प्यार करते हैं जिनके विचार सुन्दर हों, जिनका मन सुन्दर हो, जो मीठा बोलें, मुस्कुरा कर बात करें, सबका भला करने की कोशिश करें, और किसी को दुःख न पहुँचाएँ। मैं तो, साथियो, हमेशा यही कोशिश करता हूँ कि सबसे अच्छा बर्ताव करूँ, ताकि सब मुझसे प्यार करें। अगर आप भी चाहते हों कि सब आपसे प्यार करें; तो आप भी सबके साथ अच्छा बर्ताव करिए। समझ गए न?

यह लीजिए! बात हो रही थी स्वाति की, और हम ले बैठे कोई दूसरी-ही बात। तो, स्वाति को गुलाबी रंग बेहद पसंद था। गुलाबी रिबन, गुलाबी फ़्रॉक, गुलाबी मोज़े, गुलाबी जूते – ज़्यादातर वह गुलाबी रंग से ही लैस रहती। वैसे, कहते हैं, हममें से हर किसी को कोई-न-कोई दुःख, कोई-न-कोई तकलीफ़ तो होती ही है। है, न! तो साथियो, हमारी स्वाति को भी एक दुःख, एक तकलीफ़ थी। जहाँ सारे बच्चे बेसब्री से छुट्टियों का इंतज़ार करते, वहीं चोरी-छुपे हमारी स्वाति यह मनाती कि छुट्टियाँ कभी हों ही नहीं।

इसकी वज़ह यह थी कि छुट्टियों में स्वाति अकेली पड़ जाती थी। उसके पापा-मम्मी काम पर चले जाते, और वह अपनी आया झूमा के साथ वादी के कोने में बने अपने मकान में अकेली रह जाती। खिड़की के पास खड़ी हो कर, हाथ हिला-हिला कर, स्वाति मम्मी-पापा को तब तक टाटा करती जब तक वे सड़क पर दिखाई देते। पापा-मम्मी जब आँखों से ओझल हो जाते, तब स्वाति खिड़की के पास खिलौनों से खेलती। कभी गुड्डे-गुड़िया का ब्याह रचाती तो कभी गुड़िया को पार्टी ड्रेस पहनाती। कभी किसी कॉमिक को दोबारा पलटती, तो कभी अपनी मम्मी की किताबें पढ़ने की कोशिश करती। कभी टीवी देखती, कभी रेडियो सुनती और कभी म्यूज़िक सिस्टम पर गाने, पर उसका मन किसी चीज़ में भी ज़्यादा देर तक नहीं लगता। पापा का स्नेह, मम्मी का प्यार, सहेलियों की चुहल – इन सबके मुक़ाबले बेजान गुड्डे-गुड़िया, किताबें, और टीवी-रेडियो-म्यूज़िक सिस्टम भला कब तक उसका मन बहलाते? वह घण्टे-डेढ़ घण्टे में ही परेशान हो जाती और आया को पुकारती, "झूमा! मम्मी कब आएँगी?"

"बाबा, मम्मी तो शाम को आएँगी।"

"झूमा! पापा कब आएँगे?"

"बाबा, पापा भी शाम को आएँगे।"

"तो फिर तुम यहाँ क्या कर रही हो? तुम भी घर जाओ। छोड़ दो मुझे अकेला!"

"बाबा, मैं आपको अकेला कैसे छोड़ दूँ? मम्मी-पापा ग़ुस्सा करेंगे।"

बारह बजते-बजते स्वाति का पारा आसमान छू जाता। वह आया से झगड़ती। कभी दो निवाले खाती, कभी भूखी-ही रह जाती। दोपहर को जब आया सो जाती, स्वाति खिड़की पर एक बार फिर आती। पेड़ों पर चहचहाते परिन्दों को देखती। साँप जैसी टेढ़ी-मेढ़ी सड़क पर चलते पहाड़ी लोगों को देखती। गाड़ियों को देखती, जो इतनी दूर से नाखून से भी छोटी लगतीं। और फिर उसकी निगाहें अटक जातीं एक छोटे-से मकान पर। दोपहर बाद वह मकान धूप में चमक उठता। उसकी भूरी चिमनी सोने जैसी जगमगाती, और उसकी छत पर बनी टंकी से लगे स्टील के पाइप चाँदी जैसे चमचमाते। 

सफ़ेद रंग का वह मकान आस-पास के हरे बग़ीचे में ऐसा दिखता, जैसे हरे सीप में मोती चमक रहा हो। इतनी सुन्दर चीज़ दिखे, तो हर कोई निहारेगा। लेकिन स्वाति तो उस मकान को बड़े ख़ास अंदाज़ से देखती। जानते हैं, क्यों? क्योंकि दोपहर में जब वह मकान सूरज की किरणों में नहाता, तो उसका हरा दरवाज़ा खुलता। बाहर आतीं एक महिला। वह महिला स्याह रंग के एक गाउन में होतीं। सफ़ेद बाल उनके कंधों पर बेतरतीब बिखरे होते। उनके पैरों में ऊनी मोज़े होते, जूते होते, दाएँ हाथ में होती एक छड़ी, और बाएँ हाथ में होता एक मग। वैसा मग नहीं जो प्लास्टिक का होता है, जिससे पेड़-पौधों पर पानी डालते हैं। वैसा मग, जो चीनी मिट्टी का होता है, जिसमें चाय-कॉफ़ी पीते हैं। वह महिला भूरे फ्रेम का एक चश्मा लगाए होतीं, जिसके शीशे गोल कटे होते। वे दरवाज़े से बाहर आतीं, सूरज को देखतीं, और बग़ीचे में ख़रामा-ख़रामा आगे बढ़तीं। बग़ीचे में एक बेंच थी। वे उस बेंच के हत्थे पर इतने हौले-से छड़ी टिकातीं, जैसे ज़रा-भी ज़ोर से छड़ी रखने पर या तो बेंच टूट जाएगी या छड़ी, या कोई ज़ोरदार धमाका होगा जिससे आसपास के परिंदे और जानवर घबरा जाएँगे। वे धीमे से बेंच के सामने आतीं और उस पर बैठ जातीं अपना गाउन सम्हालते हुए। न जाने कितनी चाय या कॉफ़ी समाती थी उनके मग में! वे घण्टा-भर उस मग से चुस्कियाँ लेतीं। बग़ीचे की गिलहरियाँ उन्हें शायद उस बेंच का ही एक हिस्सा समझती थीं। पेड़ से गिरे फल खाने के लिए गिलहरियाँ उनके बहुत क़रीब पहुँच जातीं, पर उन महिला को जैसे कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता। वे शान्त बैठी रहतीं। जब धूप बग़ीचे से सरक कर बाहर फिसल जाती, वे धीमे-धीमे उठतीं, अपनी छड़ी सम्भालतीं, और घर के अन्दर दाख़िल हो जातीं। हरा दरवाज़ा बन्द हो जाता। 

स्वाति को बड़ा कौतूहल होता। एक दिन वह उन महिला को घर के अन्दर घुसते देख रही थी कि महिला दरवाज़े पर ठिठक कर घूमीं, और स्वाति की तरफ़ ही देखने लगीं। साँस लेने की आवाज़ बड़े क़रीब से आई। डर के मारे स्वाति को पीठ पर चींटियाँ-सी रेंगती महसूस हुईं। तभी एक आवाज़ आई, "बाबा!" स्वाति घबराहट में काँप गई। उसका गला सूख गया। लेकिन यह आवाज़ झूमा की थी। स्वाति को घबराया देख झूमा परेशान हो गई। 

"क्या हुआ बाबा? तबीयत तो ठीक है?"

"वह... वह... " स्वाति ने छोटे मकान की ओर इशारा किया।

झूमा ने मकान की तरफ़ देखा। अब तक महिला अन्दर जा चुकी थीं। हरा दरवाज़ा बन्द हो चुका था। झूमा को कुछ भी अजीब न दिखा।

"’वह’ क्या, बाबा?"

"वह, उस मकान में सचमुच कोई रहता है या... "

झूमा स्वाति के डर का सबब जान गई। 

"वह! वह तो मिसेज़ मैसी हैं, बाबा।"

"मिसेज़ मैसी कौन हैं? वह ऐसे अकेले क्यों घूमती हैं?"

"मिसेज़ मैसी एक विधवा हैं।"

"विधवा, यानी?"

"विधवा, यानी जिसके पति का देहान्त हो गया हो।"

"ओह!" स्वाति का भय करुणा से भींग गया। "तो, उनका कोई बच्चा नहीं है क्या?" उसने पूछा।

"बाबा, मिसेज़ मैसी के पति भारतीय फ़ौज में थे। सन् 1971 की लड़ाई में वे शहीद हो गए। उस समय मिसेज़ मैसी बाईस-तेईस साल की थीं। उनका एक बच्चा था, एक लड़का। मिसेज़ मैसी उन दिनों दिल्ली में रहती थीं। उन्होंने अपने लड़के को पढ़ाया-लिखाया, लायक़ बनाया। और एक दिन उनका लड़का भी फ़ौज में भर्ती हो गया। मिसेज़ मैसी उस लड़के की शादी का इन्तज़ाम कर रही थीं कि उनका लड़का करगिल सीमा पर शहीद हो गया। अब तो उस बात को भी बरसों गुज़र गए। मिसेज़ मैसी रातों-रात बुड्ढी हो गईं।"

"उन्होने अपने बेटे को फ़ौज में भेज कर ग़लती की न? अगर उनका लड़का फ़ौज में न होता, तो अभी ज़िन्दा होता और मिसेज़ मैसी को अकेली नहीं रहना पड़ता।"

"बाबा, ऐसी बातें बुज़दिल करते हैं। मरने को तो आदमी पेड़ से गिर कर भी मर जाता है और नदी में डूब कर भी, पर अपने वतन के लिए अपनी जान की बाज़ी लगा देने की हिम्मत तो, बस, दिलेरों में ही होती है। मिसेज़ मैसी तो बोलती हैं कि अगर उनका कोई दूसरा लड़का होता, तो उसे भी वे फ़ौज में ही भेजतीं दुश्मनों के दाँत खट्टे करने के लिए।"

"हूँ ऽऽऽ...," स्वाति सोच में डूब गई। न जाने क्यों उसे ऐसा लगा जैसे मिसेज़ मैसी उससे कहीं ज़्यादा अकेली हों। काश, वह उनके साथ दिन गुज़ार पाती! लेकिन पापा-मम्मी की सख़्त हिदायत थी कि घर छोड़ कर कहीं न जाना।

शाम होने को थी। झूमा ने खिड़की बन्द कर दी। सर्द हवाओं से बीमार पड़ने का डर था वरना। पापा-मम्मी के घर लौटने का वक़्त भी होनेवाला था। स्वाति उनका इन्तज़ार करने लगी। दो दिन बाद उसका जन्मदिन था। एक साल से स्वाति को इस दिन का इन्तज़ार था। कभी सोचती कि गुड़ियों का नया सेट माँगे, तो कभी सोचती कि बेबी साइकिल माँगे। कभी उसका मन किसी नए गैजेट पर अटक जाता। आप भी तो अपने जन्मदिन पर तोहफ़ों की फ़र्माइश करते होंगे!

शाम को मम्मी-पापा के आने से लेकर रात बिस्तर पर सोने तक स्वाति उनसे बातें करती रही। अंत में पापा ने पूछा, "हमारी प्यारी बेटी को बर्थ डे पर क्या चाहिए?"

स्वाति के मन में आया कि साइकिल से ले कर गैजेट तक सारी फ़ेहरिस्त सुना डाले। लेकिन मिसेज़ मैसी के त्याग की बात सुनने के बाद उसे कुछ भी माँगने की इच्छा न हुई। उसने कहा, "बस, पापा-मम्मी, उस दिन आपलोग जल्दी लौट आइएगा।"

और फिर स्वाति का जन्मदिन आ गया। मम्मी-पापा ने उसे उठाया, प्यार किया, और मम्मी ने एक सुन्दर-सी गुड़िया थमा दी उसके हाथ में। पापा ने उसे बेंत की एक डोलची दी। स्वाति ने डोलची में झाँक कर देखा तो उसकी बाँछें खिल गईं। डोलची में एक नन्हा-सा कुत्ता था। सफ़ेद और भूरे बालों वाला वह कुत्ता बटन जैसी आँखों से स्वाति को देख रहा था। स्वाति ने उसकी पीठ पर हाथ फेरा, तो कुत्ता लपक कर उसकी गोद में बैठ गया और उसकी नाक से नाक रगड़ने की कोशिश करने लगा।

पापा-मम्मी उस दिन जल्दी लौटने का वायदा कर के गए। स्वाति ने नए कपड़े पहने। वह बहुत ख़ुश थी। उसका जन्मदिन जो था! दोपहर में ही पापा-मम्मी वापस आ गए। स्वाति गुड्डे-गुड़िया से खेल रही थी। पापा बोले, "और वह भू-भू क्या हुआ, हमारी स्वाति बिटिया के अकेलेपन का साथी?"

स्वाति उन्हें खिड़की के पास ले गई। पापा, मम्मी और स्वाति ने देखा, सामने छोटा-सा मकान धूप में चमक रहा था। बेंच के हत्थे पर छड़ी टिकी थी, पर बेंच पर मिसेज़ मैसी नहीं थीं। वे बग़ीचे में खड़ी थीं और कुत्ता उनके इर्द-गिर्द उछल रहा था। मिसेज़ मैसी को इतना ख़़ुश देख कर स्वाति चहक उठी, "पापा! कल तक मैं अपनी ख़ुशी से ख़ुशी मानती थी। आज दूसरों की ख़ुशी से मुझे इतनी ख़ुशी मिल रही है कि क्या बताऊँ! आपके तोहफ़े ने मुझे ख़ुशी दी और मिसेज़ मैसी का अकेलापन दूर कर दिया।" वह अपने पापा से लिपट गई।

सच है, जो ख़ुशी त्याग में होती है, दूसरों को प्रसन्नता देकर मिलती है, उससे अच्छी कोई ख़ुशी नहीं होती। अगर हर कोई अपने जन्मदिन पर दूसरों को ख़ुशी का तोहफ़ा दे, तो दुनिया में कोई दुःखी नहीं रहेगा।  
 

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