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जितेन्द्र मिश्र ’भरत जी’ – 001 मुक्तक

1.
अपनी खिचड़ी अलग पकाना, जबसे हमने सीखा है।
प्रेमभाव सब दूर हुआ है, दुःख का बादल देखा है।
रिश्ते सारे दूर हुए हैं, झूठी शान-दिखावे में।
खोया हमने क्या पाया है, नफ़रत का फल तीखा है।
2.
स्वाभिमान से जीने वाले, कभी भीख नहीं माँगते।
श्रम करके ही करें गुज़ारा, सत्य मार्ग पहचानते।
बाधाएँ कितनी भी आएँ, धैर्य से लेते काम सदा।
प्रेमभाव रखते हैं मन में, ईश्वर को हैं मानते।
3.
शिक्षा का अधिकार, मिले हर बच्चे को।
प्यार और दुलार, मिले हर बच्चे को।
बच्चे ही तो कल, के कर्णाधार हैं।
भरपेट आहार, मिले हर बच्चे को।
4.
प्रेम सदा मन में, अपने पलने दो।
क़दमों को उन्नति, पथ पर चलने दो।
कष्टों में विचलित, कभी न होना तुम।
जो तुमसे जलता, उसको जलने दो।
5.
अब गाँव के लोग भी अनजान से लगते हैं।
कभी-कभी दीखते हैं मेहमान से लगते हैं।
आपस में प्रेम और लगाव कहीं खो गया है।
अब खेत-खलिहान सुनसान से लगते है।

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