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जितेन्द्र मिश्र ‘भास्वर’ – 003 मुक्तक

1. 
बुज़ुर्गों की क़ीमत समझो, वो अनमोल होते हैं। 
अनुभव तमाम जीवन के, इनके क़रीब होते हैं। 
माना कि लोग आजकल, इनको तवज्जो नहीं देते। 
पर जिनके साथ रहते हैं, वो ख़ुशनसीब होते हैं। 
 
2. 
खड़ी अट्टालिकाओं में, अनेकों लोग रहते हैं। 
बसे हैं गाॅंव से आकर, शहर में कष्ट सहते हैं। 
प्रकृति की गोद से निकले, कहाॅं रहने लगे आकर, 
बड़ी मजबूरियॉं हैं पर, किसी से कुछ न कहते हैं। 

3. 
अब तो कुनबे बिखरने लग गये हैं। 
लोग अकेले सँवरने लग गये हैं। 
आपस में लगाव कहीं खो गया है। 
अब अपने ही अखरने लग गये हैं। 
 
4. 
दाॅंव-पेंच से हो रही, सबकी नौका पार। 
जीत किसी को मिल गयी, और किसी की हार।
झंझावातों से घिरा, मानव है बेचैन। 
सभी चाहते हैं मिले, ख़ुशियों की बौछार॥

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