अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

जो बीत गए वो दिन भी अच्छे थे

जो बीत गए वो दिन भी अच्छे थे
जो साथ रहे वो दोस्त भी सच्चे थे!
 
न पैसों का फ़िक्र, न समय का ख़्याल था
न भविष्य का ज़िक्र, न बातों का मलाल था!
 
जब जैसा होता वैसा कह देते थे
मतभेदों को भी हँस कर सह लेते थे!
 
कभी मज़ाक बन जाते, कभी बना भी देते थे
रोते रोते इक दूजे को हँसा भी देते थे!
 
बचपन का वो भोलापन, लड़कपन से जवानी
कॉलेज की वो मोहब्बत और आँखों में पानी!
 
सपनों की वो दौड़, उम्मीदों की रवानी
हर दिन गढ़ते थे कोई नई कहानी!
 
मोबाइल का दौर नहीं चिट्ठियों का काल था
दूरियाँ थीं बहुत, दिलों मे सबका ख़्याल था!
 
मज़हबी ताना बाना भी क्या ख़ूब था
आपसी रिश्तों का ऐसा गठजोड़ था!
 
न हिंदू थे न मुसलमान थे
आँखों में एक दूसरे की बस इंसान थे!
 
जो बीत गए वो दिन भी अच्छे थे
जो साथ रहे वो दोस्त भी सच्चे थे!

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

528 हर्ट्ज़
|

सुना है संगीत की है एक तरंग दैर्ध्य ऐसी…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं