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कुछ प्रश्न पवन से

ओ पिता की लाड़ली, 
दुलारी बिटिया पवन!
यह तो बता, तू इतनी 
चंचल और मतवाली क्यों है?
तेरे भाई बंधु तो ऐसे नहीं हैं। 
धरती स्थिर,
सागर गंभीर,
गगन में विस्तार, 
अग्नि का अप्रकटन,
तुझ से सब अलग थलग। 
तू चंचल मदमाती इतनी, 
समझ न आये तेरा चलन।
सनन सनन तू चलती जाये,
हौले हौले इठलाती आये। 
रहे कैसे तू इतनी मस्त मगन,
घूमे दिग-दिगंत।
कभी आँधी बन,
कभी झंझावाती तूफ़ान बन,
जलवे दिखाए ‘हुदहुद’ के भी। 
शीत लहर लाए साथ कभी,
कभी लू के थपेड़े बरसाए। 
पता नही क्यों? 
अपनाये तूने रंग-ढंग अनेक। 
ना रूप तेरा कोई, न आकार 
फिर भी यह अहसास कराये 
हर दम, हर पल,रहती हम सब के आस पास। 
माना, 
हम पर तेरा ऋण बहुत। 
साँसों का आना जाना 
सब तुझ से जुड़ा 
तू रुक जाये, तो 
जीना मुश्किल हो जाये। 
पर यह तो बता, 
उसके बदले तू मन को क्यों 
अपने संग मिलाये 
अपनी चाल से उसे उड़ाए।
तन बसेरा छोड़
वह तेरी ओर जाये,
पकड़ में न आये, उड़ता ही जाये 
क्यों भला? 
एक बात और बता,
अग्नि से दोस्ती कर 
उसे भड़काती हो,
और ज़्यादा बढ़ाती हो। 
दीये से दुश्मनी क्यों? 
जो हृदय जला तम से लड़ता है,
उसे हौले से आ बुझाती हो। 
रहो लाड़ली पिता की, पर 
कुछ अनुशासन तो सीखो। 
भला बुरा समझो, और समझाओ हम को भी। 
क्यों लहरों संग मिल 
सुनामी लाती हो 
हँसती खेलती दुनिया पर
झाड़ू लगा जाती हो 
जल थल करके एक 
आनंद कहाँ का पाती हो?
कैसे करोगी सामना 
जा कर अपने पिता का?
जब देना होगा हिसाब तुझे 
तेरे भले बुरे कर्मों का। 
कुदरत का हर नियम सब के लिए एक है। 
है न? 
ओ मतवाली पवन!

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