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पुष्पा मेहरा - 1

1.
धरती – नारी सह रही, पशुमन का अन्याय।
रहतीं दोनों चुप सदा, मिले न उनको न्याय॥
2.
दीवारें उठने लगीं, मन भी हुए पाषाण।
खड़े भवन ढहने लगे, मिले न जन को त्राण॥
3.
दुनिया के बाज़ार में, स्वारथ का व्यापार।
मात-पिता दर-दर फिरें, बढ़े सखा–परिवार॥
4.
जगत अजनबी हो गया, संग-साथ नहिं कोय।
राहें अनजानी हुईं, मन की सुने न कोय॥
5.
धूप–दीप नैवेद्य दे, प्रभु पूजा दिन–रैन।
स्वर्ण हिरण की कामना, छीने मन का चैन॥
6.
नारी जग की नींव है, नारी नर का सार।
झुकी कमर ले ढो रही, रिश्तों का संसार॥
7.
ओढ़ ओढ़नी ओस की, बिछी पड़ी थी दूब।
प्रातभ्रमण के दर्प ने, रौंदा उसको ख़ूब॥
8.
अँजुरी फूलों की खुली, उड़ने लगी सुबास।
डाल–डाल है कह रही, आया है मधुमास॥

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