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सम्भावना का सपना

(कुछ न कुछ टकराएगा ज़रूर)
प्रेषक : रेखा सेठी

 

जब तय है कि
सफ़र कहाँ पहुँचाएगा
तो सफ़र क्या हुआ
ख़ासतौर से इन दिनों
जब सारे रास्ते
डोरियाँ बने हुए हैं कुछ हाथों में

 

हर मील के पत्थर पर
पहुँच कर
सुस्ताना भी अपराध लगने लगता है
लेकिन पैर थक जाते हैं
भूख अभी भी लगती है
नींद आँखों में उतर आती है
— ताज्जुब है

 

धूल-धक्कड़ के बीच
चाँद चमकने की कोशिश में लगा है
मालूम है कि
पहाड़ पर चढ़ कर
इसे छुआ जा सकता है
लेकिन ख़ाली जेब खाई होती है
वो पहाड़ तक नहीं पहुँचाती
जो वहाँ रहते हैं
वो चाँद नहीं देखते
??? सिकुड़ कर
दरवाज़े खिड़कियाँ बन्द रखते हैं

 

लोग कहते हैं
शहर सम्भावना है –
स्कूल कॉलेज अस्पतालों से भरा
पक्की सड़कों और
लाल हरी नीली सफ़ेद
भूत-बसों का
जादूगरी सपना –
जहाँ प्राणायाम
भर देता है फेफड़ों में
विषैली गैस

 

फिर भी शायद जलूस
यहीं से चलेगा
डोरियाँ यहीं हद तक तनेंगी
टूटेंगी
यात्रा भी यहीं से
जंगल में पगडण्डियाँ बनाएगी

 

या सिर्फ़ यह एक
मध्यवर्गी सपना है
जड़ें तलाशती दुनिया में
एक नया गुटबन्दी वहम!

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