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ब्रह्मांड की खोई हुई वस्तुओं का कार्यालय

 

मुझे हमेशा लगता था
कि खोई हुई चीज़ें
बस खो जाती हैं।
फिर एक रात
मैंने सपना देखा
कि ब्रह्मांड के किसी भूले हुए कोने में
एक विशाल कार्यालय है।
उसके बाहर एक पट्टिका लगी है—
“खोई हुई वस्तुओं का विभाग”
मैं भीतर गई।
कमरा अंतहीन था।
दीवारों तक फैली अलमारियाँ।
अनगिनत दराज़ें।
लाखों फ़ाइलें।
और हर फ़ाइल पर
किसी खोई हुई चीज़ का नाम लिखा था।
एक दराज़ खोली।
उसमें मेरा बचपन था।
वह दिन
जब मुझे यक़ीन था
कि दुनिया मूलतः अच्छी जगह है।
दूसरी दराज़ में
वह साहस रखा था
जिसके साथ मैंने पहली बार
अपने सपनों का नाम लिया था।
तीसरी में
एक दोस्ती थी
जो किसी झगड़े से नहीं,
समय की कमी से मर गई।
मैं आगे बढ़ी।
एक शेल्फ़ पर
उन सभी प्रेमों का संग्रह था
जो शुरू होने से पहले समाप्त हो गए।
एक और पर
वे पत्र रखे थे
जो कभी भेजे नहीं गए।
एक पूरी अलमारी
उन क्षमाओं के नाम थी
जो माँगी जा सकती थीं,
लेकिन माँगी नहीं गईं।
और सबसे बड़ी अलमारी—
वह इतनी विशाल थी
कि उसकी छत दिखाई नहीं देती थी।
मैंने पूछा,
“इसमें क्या रखा है?”
वहाँ बैठे बूढ़े क्लर्क ने कहा—
“संभावनाएँ।”
“कौन-सी संभावनाएँ?”
मैंने पूछा।
वह मुस्कुराया।
“वे जीवन,
जो लोग जी सकते थे।”
मैंने भीतर झाँका।
वहाँ एक स्त्री थी
जो कवयित्री बन सकती थी
लेकिन डर गई।
एक पुरुष था
जो अपने पिता को माफ़ कर सकता था
लेकिन उसने प्रतीक्षा की।
एक बच्चा था
जो संगीतकार बनना चाहता था,
पर उसे समझाया गया
कि सपनों से घर नहीं चलते।
और वहाँ
मेरा भी एक जीवन रखा था।
वह जीवन
जिसमें मैंने कम भय खाया था
और अधिक आकाश देखा था।
मैंने बूढ़े से पूछा—
“क्या लोग अपनी खोई हुई चीज़ें
वापस ले जा सकते हैं?”
उसने बहुत देर तक
मेरी ओर देखा।
फिर बोला—
“कुछ चीज़ें नहीं खोतीं।
वे केवल छोड़ी जाती हैं।”
“और कुछ?”
मैंने पूछा।
वह खिड़की की ओर देखने लगा।
ब्रह्मांड बाहर
धीरे-धीरे घूम रहा था।
उसने कहा—
“कुछ चीज़ें लौट सकती हैं।
लेकिन लोग अक्सर
उन्हें पहचान नहीं पाते।”
मैंने आख़िरी प्रश्न पूछा—
“इस कार्यालय की सबसे भरी हुई अलमारी कौन-सी है?”
उसकी आँखों में
अचानक एक पुरानी उदासी उतर आई।
उसने कहा—
“वे शब्द
जो लोग कहना चाहते थे,
लेकिन कह नहीं पाए।”
मैं चुप हो गई।
क्योंकि उसी क्षण
मुझे याद आया—
मेरे भीतर भी
एक पूरा कमरा भरा पड़ा है
अनकहे प्रेम से,
अनमाँगी क्षमा से,
अनजिए जीवन से।
और तब समझ में आया—
ब्रह्मांड की सबसे खोई हुई वस्तुएँ
चाबियाँ,
पर्स,
या रास्ते नहीं हैं।
सबसे खोई हुई वस्तुएँ
वे हिस्से हैं
जो मनुष्य
जीवन भर स्वयं से छिपाता रहता है।
शायद इसी कारण
ब्रह्मांड इतना विशाल है।
उसे जगह चाहिए
उन सब चीज़ों को सँभालने के लिए
जिन्हें हम खो देते हैं,
और उन सबको भी
जिन्हें हम कभी जी ही नहीं पाते।

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