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मृत लोगों की वस्तुएँ कहाँ जाती हैं?

 

दादा के मरने के बाद
घर में सबसे ज़्यादा अकेली चीज़
उनकी कुर्सी थी।
पहले कई दिनों तक
कोई उस पर नहीं बैठा।
जैसे लकड़ी भी
शोक मना रही हो।
सुबह की धूप
अब भी उसी तरह
बरामदे में आती थी,
लेकिन उसके पास बैठने वाला आदमी
अब पृथ्वी पर नहीं था।
फिर भी
धूप आती रही।
कुर्सी वहीं रही।
और दुनिया
अपनी निर्दय नियमितता से चलती रही।
मृत्यु के बारे में
मुझे सबसे विचित्र बात यही लगती है—
एक व्यक्ति चला जाता है,
लेकिन उसके आसपास की चीज़ें
उसे सच नहीं मानतीं।
अलमारी में टँगी कमीज़
कई महीनों तक
उसके लौटने की संभावना बचाए रखती है।
तकिए पर पड़ा हल्का-सा गड्ढा
रातों को मिटने से इंकार करता है।
एक पुराना रुमाल
अब भी उसकी जेब का आकार लिए रहता है।
जैसे वस्तुएँ
मनुष्यों से अधिक वफ़ादार होती हों।
माँ ने दादा की घड़ी
सालों तक नहीं हटाई।
वह बंद थी।
उसकी सुइयाँ
एक ही समय पर अटकी थीं।
लेकिन शायद
घर में किसी को
उस समय को आगे बढ़ाने का साहस नहीं था।
मैंने तब जाना—
कुछ घड़ियाँ समय नहीं बतातीं,
वे अनुपस्थिति को मापती हैं।
धीरे-धीरे
कुर्सी पर दूसरे लोग बैठने लगे।
कमीज़ें बाँट दी गईं।
रुमाल खो गया।
घड़ी दराज़ में चली गई।
और जीवन,
जैसा कि वह हमेशा करता है,
आगे बढ़ गया।
लेकिन क्या सचमुच?
कभी-कभी
जब मैं अपने हाथ से
वैसी ही गाँठ बाँधती हूँ
जैसी दादा बाँधते थे,
जब किसी बात पर
ठीक उनकी तरह हँस पड़ती हूँ,
जब अनजाने में
उनका कोई वाक्य बोल देती हूँ,
तब लगता है—
वस्तुएँ कहीं नहीं गईं।
उन्होंने अपना रूप बदल लिया।
वे लकड़ी से आदत बन गईं।
घड़ी से स्मृति।
रुमाल से भाषा।
और मनुष्य से विरासत।
शायद मृत्यु का अर्थ
ग़ायब हो जाना नहीं है।
शायद मृत्यु का अर्थ है—
धीरे-धीरे वस्तुओं से निकलकर
लोगों के भीतर बस जाना।
इसीलिए
मृत लोगों की वस्तुएँ
किसी कबाड़खाने में नहीं पहुँचतीं।
उनका अंतिम पता
हमारी स्मृति होती है।
और स्मृति,
दुनिया का एकमात्र घर है
जहाँ मृतक
बिना आवाज़ किए
अब भी रहते हैं।

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