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एक घर की आत्मकथा

 

मेरा जन्म
किसी अस्पताल में नहीं हुआ था।
कुछ मज़दूरों के हाथों,
कुछ अधूरे नक़्शों,
और बहुत-सी उम्मीदों के बीच
मैं धीरे-धीरे खड़ा किया गया था।
जब मेरी पहली दीवार उठी,
एक आदमी ने दूर खड़े होकर कहा था—
“अब अपना घर होगा।”
उसकी आवाज़ में
ईंटों से ज़्यादा भविष्य था।
मैंने लोगों को आते देखा।
एक नई दुल्हन को
दहलीज़ पर चावल गिराते देखा।
एक बच्चे को
मेरी दीवारों पर
टेढ़े-मेढ़े सूरज बनाते देखा।
एक बूढ़ी औरत को
हर शाम तुलसी के पास दीपक जलाते देखा।
लोग समझते हैं
कि घरों में लोग रहते हैं।
सच यह है—
हम घरों में
लोगों के समय रहते हैं।
मेरे कमरों में
अब भी कुछ हँसियाँ टँगी हैं,
जो वर्षों पहले ख़त्म हो चुकी हैं।
कुछ झगड़े
अब भी मेरी छत से चिपके हुए हैं।
कुछ सपने
मेरे कोनों में धूल की तरह जमा हैं।
एक बार
इस घर में एक लड़की बहुत रोई थी।
इतना रोई थी
कि कई दिनों तक
मुझे लगता रहा
मेरी दीवारें नम हैं।
फिर एक दिन
वह चली गई।
लोगों ने कहा—
“बेटियाँ पराई होती हैं।”
लेकिन उन्होंने नहीं देखा
कि उसके जाने के बाद
मेरी सीढ़ियाँ कितने दिनों तक
ख़ाली-ख़ाली रहीं।
एक बूढ़ा आदमी
हर सुबह बरामदे में बैठता था।
धीरे-धीरे
उसकी चाल छोटी होती गई।
फिर एक दिन
उसकी कुर्सी वहीं रही,
वह नहीं।
आज भी
जब हवा उस कुर्सी से टकराती है,
मुझे लगता है
कोई अभी बैठने वाला है।
मैंने जन्म देखे हैं।
मृत्यु देखी है।
प्रेम देखा है।
विश्वासघात भी।
मैंने देखा है
कि सबसे गहरे घाव
उन कमरों में बनते हैं
जहाँ सबसे ज़्यादा प्रेम रहा होता है।
लोग मुझे रँगते रहे,
मरम्मत करते रहे,
नए पर्दे लगाते रहे।
लेकिन कोई नहीं जानता,
घर भी बूढ़े होते हैं।
मेरी दीवारों में
अब हल्की दरारें हैं।
वे सिर्फ़ सीमेंट की दरारें नहीं,
वे उन वर्षों की रेखाएँ हैं
जो मेरे भीतर से गुज़रे हैं।
कभी-कभी
रात के बहुत शांत समय में
मैं अपने ही कमरों को सुनता हूँ।
किसी कमरे में
एक पुरानी हँसी चल रही होती है।
किसी में
किसी की प्रतीक्षा।
किसी में
एक अधूरी माफ़ी।
और तब समझ में आता है—
मैं ईंटों और छत का बना ढाँचा नहीं हूँ।
मैं उन सब लोगों का संग्रहालय हूँ
जो यहाँ रहे,
प्रेम किया,
टूटे,
बदले,
और चले गए।
एक दिन
मैं भी गिर जाऊँगा।
मेरी दीवारें मिट्टी हो जाएँगी।
मेरी खिड़कियाँ
किसी कबाड़ी की दुकान में बिक जाएँगी।
लेकिन मुझे यक़ीन है—
जिन लोगों ने मुझे घर कहा था,
उनकी थोड़ी-सी ज़िंदगी
मेरी धूल में बची रहेगी।
क्योंकि घर
कभी पूरी तरह नहीं मरते।
वे उन लोगों की स्मृति में जीवित रहते हैं
जो किसी शहर से गुज़रते हुए
अचानक कह उठते हैं—
“यहीं कहीं हमारा घर हुआ करता था।”
 

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