चाह मिलने की जागी सनम है
शायरी | ग़ज़ल सत्यवान साहब गाज़ीपुरी15 May 2026 (अंक: 297, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़े
212 212 212 2
रंग बरसे, बहकते क़दम हैं
चाह मिलने की जागी सनम है
तुम कहो तो फ़ज़ा ही बदल दें
यूँ तेरा चुप भी रहना सितम है
तुम यहीं, हम कहीं ढूँढ़ते हैं
क्यों कि हम ख़ुद में मौजूद कम हैं
दिल में उठती लहर इस तरह की
दूर हो के भी नज़दीक हम हैं
फूल खिलते तो हैं मुस्कुराकर
रौंद देती हवा बेर'हम है
'साहब' उसकी गली जो भी गुज़रा
आज तक आँख सब ही के नम है
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