चाह मिलने की जागी सनम है
शायरी | ग़ज़ल सत्यवान साहब गाज़ीपुरी15 May 2026 (अंक: 297, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़े
212 212 212 2
रंग बरसे, बहकते क़दम हैं
चाह मिलने की जागी सनम है
तुम कहो तो फ़ज़ा ही बदल दें
यूँ तेरा चुप भी रहना सितम है
तुम यहीं, हम कहीं ढूँढ़ते हैं
क्यों कि हम ख़ुद में मौजूद कम हैं
दिल में उठती लहर इस तरह की
दूर हो के भी नज़दीक हम हैं
फूल खिलते तो हैं मुस्कुराकर
रौंद देती हवा बेर'हम है
'साहब' उसकी गली जो भी गुज़रा
आज तक आँख सब ही के नम है
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
ग़ज़ल
- अकेले मिलेगा कहाँ चाँद फिर से
- उलझी हुई हम अपनी कहानी से भी आगे
- उसकी महफ़िल में मेरी बात कर ऐ सन्नाटा
- चाह मिलने की जागी सनम है
- जिनकी हर एक दलीलों पे फ़िदा होते रहे
- जुदा भी हों तो किसी से कोई ख़फ़ा न लगे
- जो यूँ नाज़-ए-उल्फ़त में खोते फिरोगे
- झिलमिलाती जो झरोखों से वहीं झिलमिल हो तुम
- ठहरे न मगर वक़्त, धुरी की तरह क्यूँ है
- तेरी ज़ुल्फ़ पर रात बीमार होगी
- दिल को मेरे नाम ज़रा करके देखो
- दिल ने समझा तुझे ही हल शायद
- बन के माँझी कोई पतवार लिए बैठा है
- मेरे जाने के भी क़िस्सों से महक आएगी
- रोकने को तो खड़ा पूरा ज़माना होगा
- वक़्त से आर-पार करता हूँ
- हम फ़क़त आइना दिखाते हैं
- हुस्न वालों से खुले-आम हवा दिल्ली की
नज़्म
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं