दिल ने समझा तुझे ही हल शायद
शायरी | ग़ज़ल सत्यवान साहब गाज़ीपुरी1 May 2026 (अंक: 296, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़बून महज़ूफ़ मक़तू
फ़ाएलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
2122 1212 22
दिल ने समझा तुझे ही हल शायद
तेरी आँखों ने की पहल शायद
तुम जो आई नज़र झुका करके
खो गया मैं उसी में कल शायद
तुमने मुझको दिया जहाँ चुम्बन
थम गया है वहीं पे पल शायद
मेरी परछाईं बन के चल तो दी
तुमसे हो पाए ये अमल शायद
मैं सँभलने को सोचता ही रहा
तुम ही पहले गए बदल शायद
यूँ तसव्वुर में ढल के आई तुम
बन गई हो मेरी ग़ज़ल शायद
तुम कभी जब मेरी ग़ज़ल पढ़ लो
इश्क़ हो जाए मुक'म्मल शायद
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