जो यूँ नाज़-ए-उल्फ़त में खोते फिरोगे
शायरी | ग़ज़ल सत्यवान साहब गाज़ीपुरी1 May 2026 (अंक: 296, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
मुतकारिब मुसम्मन सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
122 122 122 122
जो यूँ नाज़-ए-उल्फ़त में खोते फिरोगे
तो लाज़िम है बर्बाद होते फिरोगे
जो इंसान होकर भी जागे न दिल से
ये साँसों की लाशें ही ढोते फिरोगे
ख़ुशामद के दलदल में उलझे अगर तुम
जहालत के ही पाँव धोते फिरोगे
अगर बीज नफ़रत के बोते रहे यूँ
अदावत ही हर सू पिरोते फिरोगे
रखो हसरतें तो जतन भी करो कुछ
कि सिर्फ़ आरज़ू में ही रोते फिरोगे
ये बहकी-सी रातों की पायल की झंकार
सुनोगे न साहब, तो सोते फिरोगे
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