बन के माँझी कोई पतवार लिए बैठा है
शायरी | ग़ज़ल सत्यवान साहब गाज़ीपुरी15 May 2026 (अंक: 297, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
फ़ाएलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन
2122 1122 1122 22
कोई हालत की पड़ी मार लिए बैठा है
बन के माँझी कोई पतवार लिए बैठा है
बंद दुनिया ने की है जिसके लिए दरवाज़े
कोई उसके भी लिए हार लिए बैठा है
यूँ नहीं वक़्त की भँवर में हैं उलझी साँसें
मेरी कश्ती को ही मझधार लिए बैठा है
टूट कर भी जो खड़ा है वही सच जानता है
कोई सीने में कई वार लिए बैठा है
उसके दर पे जो झुका रहमतें बरसें सारी
सबके हिस्से का वहीं प्यार लिए बैठा है
ग़म की रातों में भी लिखता है उजालों का सफ़र
जब से 'साहब' जुदा किरदार लिए बैठा है
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