हुस्न वालों से खुले-आम हवा दिल्ली की
शायरी | ग़ज़ल सत्यवान साहब गाज़ीपुरी1 May 2026 (अंक: 296, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ मक़तू
फ़ाएलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन
2122 1122 1122 22
हुस्न वालों से खुले-आम हवा दिल्ली की
इश्क़ करती है सुबह-शाम हवा दिल्ली की
आज तो आप ही हैं ताज के सरताज यहाँ
आप भी यूँ न करें जाम हवा दिल्ली की
फूटते बम तेरे आँगन में तेरा ही लाहौर
ख़ामख़ाँ होती है बदनाम हवा दिल्ली की
ख़ौफ़ में पाक के नापाक सब आक़ा कि कहीं
रौंद दे फिर न सर-ए-आम हवा दिल्ली की
जाम नफ़रत की भले ही ये उठाए दुनिया
दे रही प्यार का पैग़ाम हवा दिल्ली की
क्या करें यूँ ये क़हर इश्क़ ने ढाया साहब
मिलना चाहे मुझे हर शाम हवा दिल्ली की
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
नज़्म
ग़ज़ल
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं