जिनकी हर एक दलीलों पे फ़िदा होते रहे
शायरी | ग़ज़ल सत्यवान साहब गाज़ीपुरी15 Jun 2026 (अंक: 299, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
रमल मुसम्मन सालिम मख़बून महज़ूफ़
फ़ाएलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़इलुन
2122 1122 1122 112
जिनकी हर एक दलीलों पे फ़िदा होते रहे
बेचते ख़्वाब हमारे वो ख़ुदा होते रहे
हमने काग़ज़ पे मुक़द्दर की इबारत जो लिखी
वो हर इक मोड़ पे क़िस्मत से जुदा होते रहे
रात भर आँख में उम्मीद के दीपक थे जले
सुबह होते ही सभी ख़्वाब धुआँ होते रहे
वो जो कहते थे हमें वक़्त बदल देगा सब
ख़ुद वही वक़्त के हाथों में फ़ना होते रहे
दिल के दरिया में कई ख़्वाब रवाँ होते रहे
हम किनारों की तरह ख़ुद से जुदा होते रहे
हम ने ईमान की दौलत को बचाए रक्खा
झूठ के साए मगर और घना होते रहे
हम ने सीखा ही नहीं वक़्त से समझौते करें
इस लिए लोग हमीं से ही ख़फ़ा होते रहे
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