मकर संक्रांति अर्थात् शुभकारी परिवर्तन
आलेख | सांस्कृतिक आलेख सोनल मंजू श्री ओमर15 Jan 2024 (अंक: 245, द्वितीय, 2024 में प्रकाशित)
भारत वर्ष को संस्कृतियों एवं त्योहारों का देश माना जाता है। ऐसे ही भारत का एक विशेष त्योहार मकर संक्रांति है। संक्रांति का अर्थ है सुक्रांती अर्थात् शुभकारी परिवर्तन। सूर्य मकर रेखा से कर्क रेखा की ओर चढ़ने लगता है। इस प्रकृति दत्त अवसर को मकर संक्रांति कहते है। मकर संक्रांति में सूर्य उत्तरायण में चले जाते है, इसके पूर्व दक्षिणायण में रहते हैं। सूर्य के दक्षिणायण में रहने के कारण दिन छोटे व रातें बड़ी होती हैं, जबकि उत्तरायण में स्थित हो जाने पर दिन बड़े व रातें छोटी होती हैं। मकर संक्रांति को स्नान और दान का विशेष महत्त्व है साथ ही तिल, गुड़, खिचड़ी, फल एवं राशि अनुसार दान करने पर पुण्य की प्राप्ति होती है। ऐसा भी माना जाता है कि इस दिन किए गए दान से सूर्य देवता प्रसन्न होते हैं।
हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार इस विशेष दिन पर भगवान् सूर्य अपने पुत्र भगवान् शनि के पास जाते हैं, उस समय भगवान् शनि मकर राशि का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं। पिता और पुत्र के बीच स्वस्थ सम्बन्धों को मनाने के लिए, मतभेदों के बावजूद, मकर संक्रांति को महत्त्व दिया गया। ऐसा माना जाता है कि इस विशेष दिन पर जब कोई पिता अपने पुत्र से मिलने जाता है, तो उनके संघर्ष हल हो जाते हैं और सकारात्मकता ख़ुशी और समृद्धि एक साथ साझा हो जाती है। इसके अलावा इस विशेष दिन की एक कथा और है, जो भीष्म पितामह के जीवन से जुड़ी हुई है, जिन्हें यह वरदान मिला था, कि उन्हें अपनी इच्छा से मृत्यु प्राप्त होगी। जब वे बाणों की सज्जा पर लेटे हुए थे, तब वे उत्तरायण के दिन की प्रतीक्षा कर रहे थे और उन्होंने इस दिन अपनी आँखें बंद कीं और इस तरह उन्हें इस विशेष दिन पर मोक्ष की प्राप्ति हुई।
यह पर्व देश के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है और इसी ख़ूबी के कारण मकर संक्रांति का पर्व अन्य सभी त्योहारों से अलग व विशिष्ट बन जाता है। तो चलिए जानते हैं देश के विभिन्न हिस्सों में किस तरह सेलिब्रेट किया जाता है यह पर्व।
पंजाब में इसे लोहड़ी के नाम से पुकारते है, जिसमें लकड़ियों व उपलों की आग बना कर उसके चारों ओर फेरी लगा कर नाचते गाते हैं और तिल, रेवड़ी इत्यादि चढ़ाते है। वहीं तमिलनाडु व आंध्र प्रदेश में पोंगल नाम से इसे मनाया जाता है। जहाँ पर लोग पोंगल मनाने के लिए सबसे पहले स्नान करके खुले आँगन में मिट्टी के बरतन में खीर बनाई जाती है, जिसे पोंगल कहा जाता है। इसके बाद सूर्य देव की पूजा की जाती है और अंत में उसी खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। वहीं गुजरात में उत्तरायण के नाम से जाना जाता है मकर संक्रांति का पर्व। गुजरात में इस दिन पतंग उड़ाने की प्रथा है। इतना ही नहीं, गुजरात में मकर संक्रांति के पर्व पर पंतगोत्सव का भी आयोजन किया जाता है। गुजराती लोगों के लिए यह एक बेहद शुभ दिन है और इसलिए किसी भी शुभ कार्य की शुरूआत के लिए इसे सबसे उचित दिन माना जाता है। असम में मकर संक्रांति को बिहू नाम से मनाते हैं। तो वहीं उत्तर प्रदेश और बिहार में मकर संक्रान्ति को खिचड़ी के नाम से पुकारा जाता है। उत्तरप्रदेश में मकर संक्रांति के दिन को दान के पर्व के रूप में देखा जाता है। इलाहाबाद में तो मकर संक्रांति के दिन से ही माघ मेले की शुरूआत होती है और माघ मेले का पहला नहान मकर संक्रांति के दिन ही किया जाता है। इस ख़ास दिन लोग स्नान के अतिरिक्त दान को भी महत्ता देते हैं। जिसमेंं खिचड़ी को मुख्य रूप से शामिल किया जाता है। इतना ही नहीं, लोग खिचड़ी को दान करने के साथ−साथ उसका सेवन भी अवश्य करते हैं।
भारत के अलावा मकर संक्रांति दूसरे देशों में भी प्रचलित है लेकिन वहाँ भी इसे अलग-अलग नाम से ही जाना जाता है। जैसे नेपाल में इसे माघे संक्रांति कहते हैं। नेपाल के ही कुछ हिस्सों में इसे मगही नाम से भी जाना जाता है। थाईलैंड में इसे सोंग्क्रण नाम से मनाते हैं। म्यांमार में थिन्ज्ञान नाम से जानते हैं। कंबोडिया में मोहा संग्क्रण नाम से मनाते हैं। श्री लंका में उलावर थिरुनाल नाम से जानते हैं। भले विश्व में मकर संक्रांति अलग-अलग नाम से मनाते हैं लेकिन इसके पीछे छुपी भावना सबकी एक है वो है शान्ति और अमन की, आस्था की। सभी इसे अँधेरे से रोशनी के पर्व के रूप में मनाते हैं।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
अक्षय तृतीया: भगवान परशुराम का अवतरण दिवस
सांस्कृतिक आलेख | सोनल मंजू श्री ओमरवैशाख माह की शुक्ल पक्ष तृतीया का…
अष्ट स्वरूपा लक्ष्मी: एक ज्योतिषीय विवेचना
सांस्कृतिक आलेख | डॉ. सुकृति घोषगृहस्थ जीवन और सामाजिक जीवन में माँ…
अस्त ग्रहों की आध्यात्मिक विवेचना
सांस्कृतिक आलेख | डॉ. सुकृति घोषजपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महद्युतिं। …
अहं के आगे आस्था, श्रद्धा और निष्ठा की विजय यानी होलिका-दहन
सांस्कृतिक आलेख | वीरेन्द्र बहादुर सिंहफाल्गुन महीने की पूर्णिमा…
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
स्वास्थ्य
कविता
पुस्तक समीक्षा
सांस्कृतिक आलेख
सामाजिक आलेख
सिनेमा चर्चा
लघुकथा
यात्रा-संस्मरण
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं