शब्दों के इस घमासान में कविता के माध्यम से स्वयं को ढूँढ़ने का प्रयास करता हूँ। इस असमानता से भरी दुनिया में समता एवं सद्भावना के बीज बोना चाहता हूँ। साहित्य रचना ही एकमात्र ऐसा पवित्र पथ है, जिस पर चलकर इंसान को इंसान बनाया जा सकता है। मानव का सिर्फ एक ही धर्म है- मानवता। मैं इसी मानवता की स्थापना के लिए साहित्य रचना करते हुए हिन्दी की सेवा में निरन्तर लगा रहना चाहता हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है मेरा यह प्रयास अवश्य रंग लाएगा।
पवन कुमार “मारुत”
सहायक आचार्य (हिन्दी),
राजकीय महाविद्यालय, कनवास,
कोटा (राज.) पिनकोड- 325602
लेखक की कृतियाँ
कविता
- अन्धे ही तो हैं
- अब आवश्यकता ही नहीं है
- अब मैं क्या करूँ
- अफ़सोस
- आख़िर मेरा क़ुसूर क्या है
- इसलिए ही तो तुम जान हो मेरी
- ऐसा क्यों करते हो
- कमअक़्ल कौन
- काली कमाई
- कितना ज़हर भरा है
- घर
- चाँदी के कड़ूले
- चाय पियो जी
- जागरण की वेला आई है
- जूती खोलने की जगह ही नहीं है
- डूब जाना ही प्रेम है
- तीसरा हेला
- तुम तो बहुत ख़र्चीली हो
- तुम्हारे जैसा कोई नहीं
- थकी हुई जूतियाँ
- दृश्य
- देखादेखी दुखदाई है
- धराड़ी धरती की रक्षा करती है
- नदी नहरों का निवेदन
- नादानी के घाव
- नफ़रत सोच समझकर कीजिए
- प्रेम प्याला पीकर मस्त हुआ हूँ
- प्लास्टिक का प्रहार
- मज़े में मरती मनुष्यता
- रहस्य
- रोटी के रंग
- रोज़ सुबह
- विधायक साहब आने वाले हैं
- संयोग या साज़िश
- सुकून की छत
- सोया हुआ समाज
- सौतन
- हैरत होती है
- ज़िल्लत की रोटी
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं