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विधायक साहब आने वाले हैं

 

टूटी-फूटी-सी सड़क, पातियों से भरी हुई, 
बीच-बीच में गहरे-गहरे गड्ढे, 
जैसे किसी घायल के तन पर पड़े हो गहरे-गहरे घाव। 
 
प्रतिदिन होती कोई न कोई अनहोनी, 
किसी दिन कोई साइकिल वाला होता जख़्मी, 
तो कभी कोई कार गड्ढों में फँस जाती, 
कभी-कभी कोई पैदल पड़ जाता गड्ढों में, 
और अक्सर बाईकें होती दुर्घटनाग्रस्त, 
और चली जाती जानें एक-दो। 
परन्तु हमारे देश में सामान्य जन का मरना भी कोई मरना है! 
क्योंकि यहाँ रोज़ाना मरते हैं हज़ारों लोग। 
 
हर महीने प्रार्थना-पत्र लिखे जाते, 
कभी सांसद को, कभी विधायक को, 
कभी वार्ड पार्षद को, कभी महापौर को, 
कभी कलेक्टर को तो कभी सार्वजनिक निर्माण विभाग को। 
 
सब जगह से आश्वासन मिलते बड़े-बड़े, 
आप भी जानते हैं कि ये कितने सच होते है और कितने झूठ। 
यहाँ सिर्फ़ आश्वासनों की ही दूकानें सजती है, 
पर असलियत वही ढाक के तीन पात, 
जैसे ऊँची दूकान फीके पकवान। 
 
वक़्त गुज़रता गया, लोग मरते रहे, 
न सड़क बनी, न मरम्मत ही हुई, 
आश्वासन ज़रूर मिलते रहे लगातार। 
काश! ये आश्वासन रोटी बन जाते, 
तो पेट तो भर जाता बहुत से लोगों का। 
 
एक दिन उसी सड़क से गुज़र रहा था रात में, 
अजीब अचम्भा देखा मैंने, 
सड़क बन रही थी। 
 
मैंने पूछा आश्चर्यवश पास खड़े व्यक्ति से, 
जो सड़क इतने दिनों से नहीं बनी, 
वह आज कैसे बन रही रातों-रात सहजता से। 
वह बोला तुम्हें इतनी-सी बात पता नहीं, 
क्योंकि कल विधायक साहब आने वाले हैं॥

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