अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

होली (तारा सिंह)

मिटे धरा से ईर्ष्या, द्वेष, अनाचार, व्यभिचार
जिंदा रहे जगत में, मानव के सुख हेतु
प्रह्लाद का प्रतिरूप बन कर, प्रेम, प्रीति और प्यार
बहती रहे, धरा पर नव स्फूर्ति की शीतल बयार
भीगता रहे, अंबर-ज़मीं, उड़ता रहे लाल, नीला
पीला, हरा, बैंगनी, रंग - बिरंगा गुलाल


मनुज होकर मनुज के लिए महा मरण का
श्मशान न करे कभी कोई तैयार
रूखापन के सूखे पत्र झड़ते रहें
दुश्मन, दुश्मनी को भुलाकर गले मिलते रहें
जिससे, मनुष्यत्व का पद्म, जो जीवन
कंदर्प में है खिला, उसकी सुगंधित
पंखुड़ियों से भू– रज, सुरभित होता रहे
खुशियों का ढाक-नगाड़ा बजता रहे
लोग झूमें, नाचें,गायें, आनंद मनायें, कहें
देखो ! धरा पर उतरी है वसंत बहार
लोग मना रहे हैं, होली का त्योहार


रूप, रस, मधु गंध भरे लहरों के
टकराने से , ध्वनि में उठता रहे गुंजार
सुषमा की खुली पंखुड़ियाँ, स्पर्शों का दल
बन कर, भावों के मोहित पुलिनों पर
छाया - प्रकाश बन करता रहे विहार
चेतना के जल में खिला रहे, कमल साकार
त्रिभुवन के नयन चित्र – सी, जगती के
नेपथ्य भूमि से निकल, दिवा की उज्ज्वल
ज्योति बन होली आती रहे बार-बार


थके चरणों में उत्सुकता भरती रहे
भू –रज में लिपटा, श्री शुभ्र धूप का टुकड़ा
रंग -बिरंगे रंगों से रँगे दीखे लाल -लाल
देख अचम्भित, आसमां कहे, देखो लगता
सृष्टि ने निज सुमन सौरभ की निधियों का
मुख –पट, दिया है, धरा की ओर खोल
चारों तरफ़ लोग खुशियाँ मना रहे
एक दूजे से गले मिल रहे. मचा रहे शोर
फूटे डाली पर कोमल पल्लव, पी गा रही
चम सुर में कह रही, डाली की लड़ियों को
मंजरियों का मुकुट पहनाने आया है
वसंत बहार, लोग मना रहे होली का त्योहार

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

नज़्म

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं