अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

जमलो मडकम

व्यवस्था के नन्हें क़दम बहुत अधिक समय तक
भूख, प्यास और गर्मी बर्दाश्त नहीं कर पाए
उस ग़रीब दाढ़ में अटका सात दिन पुराना रोटी का टुकड़ा
उसे ताज़े भोजन का स्वाद देने में नाकाफ़ी साबित हुआ


उसके केवल 12 वर्ष पुराने हाथ मिर्ची तोड़ते थे
संविधान में मौजूद 'बाल मजदूरी निषेध' करने वाले अध्याय से
जहाँ वह अपने सिर के ऊपर से विमान उड़ते देखती
लेकिन उसके लिए कहाँ कोई विमान
या स्पेशल बस आने वाली थी
उसे स्वयं ही नापना था अपनी ग़रीबी का भूगोल


ये कुछ दूसरे क़िस्म के लोग होते हैं साहब
किसी दूसरे रंग के कार्ड पर
सरकारी गाली, गेहूँ, चावल और दाल खाने वाले
किसी और रंग की ताक़तवर सरकारी जीभ
सीधा इनके मुँह में थूकती है अपने 'अध्यादेश'


वह एक सुबह निकल पड़ी थी अपने आदिवासी गिरोह के साथ
चमकदार रोशनी वाले शहरी इलाक़े को पार करती हुई
अपनी ग्रामीण लालटेन की तरफ़
जिसकी लौ के आसपास आजीवन जलता है संघर्ष


हाँ, हाँ उसी सुबह 
जब तुम अपने महँगे कप में पी रहे थे
यह गर्मागर्म उबलता हुआ 'अप्रैल'


वह निकल पड़ी थी
अपनी अंतड़ियों के व्याकरण में फैली-
बाँझ भूख को सहन करती हुई
ख़ाली वीरान सड़कों को घूरती हुई
उसने अनेक बार हवा में अपने दाँत गड़ाए थे
बेरहम किरणों से मुँह धोया था
इस बात से बिल्कुल अंजान कि 
यह कोरोना क्या बीमारी आई है
जिसने उसके हाथों से मिर्च और रोटी दोनों छीन लिए


घर से कुछ किलोमीटर पहले ही 
लड़खड़ाते जा रहे थे उसके क़दम
तुम्हे याद है, तुम्हारे हॉल की सफ़ेद टाइलों पर
कभी तुम्हारे बच्चे ने भी रखे थे 
लड़खड़ाते हुए पहले क़दम
वही क़दम जिनसे 
वह सीधा तुम्हारे हृदय पर चलता था


मृत्यु में भी ठीक उसी भाँति लड़खड़ाते हैं क़दम
और अंततः लड़खड़ाते, लड़खड़ाते
नन्ही 'जमलो मडकम' ने दम तोड़ दिया
मगर उसके शव की क़ीमत उसके घर पहुँच गई है
एक लाख रुपये।

 

नोट : बारह साल की जमलो मडकम के नाम, जो अपने घर कभी नहीं पहुँच पाई।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं