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जिज्ञासा

सृष्टि तुमने क्यों रची हे ईश! यह? 
किस लिये तुम भेजते सबको यहाँ?
कर्म करना और सुख-दुःख भोगना,
है विवशता बन गयी सबकी जहाँ॥
 
आत्मा जब अंश है परमात्मा की, 
बस रही जो देह में हर जीव की।
तब कोई क्यों पाप कर सुख भोगता,
पुण्य कर्मी भोगता है दुःख कोई॥
 
इन प्रपंचों में तुम्हीं डालो हमें,
और माया में फँसाते हो तुम्हीं।
पाप-पुण्यों का उन्हीं को नाम दे,
न्याय भी करते हमारा हो तुम्हीं॥
 
ज्ञान जागृत कर किसी के हृदय में,
क्यों दिया अज्ञान तुमने अन्य को ।
है कुरूप बना यहाँ पर कोई क्यों?
क्यों दिया सौंदर्य तुमने अन्य को॥
 
शक्त और अशक्त का संघर्ष क्यों?
धनी-निर्धन की यहाँ क्यों दूरियाँ?
विश्व में असमत्व करके फिर कहो, 
ज्ञान क्यों ‘समयोग’ का तुमने दिया॥
 
भूख भर भोजन नहीं जो पा रहा,
फिर क्षुधा को संयमित कैसे करे।
भव्य-भवनों में सुखी जो मस्त हैं,
पुण्य का संचय वही क्यों कर रहे॥
 
घूमते हैं जो विदेशी वाहनों में,
वस्त्र जिनके राजसी से शोभते।
जानते कैसे वे इनको झेलते,
वस्त्र बिन हैं शीत में जो काँपते॥
 
जन्म हमने क्यों लिया इस भूमि पर,
और हम करने यहाँ हैं आए क्या।
धर्म शास्त्रों में मतों केभेद से,
ये रहस्य हमें नहीं अब भी पता॥

सन्त कहते “कर्म जो गत जन्म के,
फल उन्हीं के भोगने आए यहाँ “।
कर्म फिर से क्यों करें इस लोक में,
भोगने हम आएँ फिर से क्यों यहाँ॥

कर्मफल सन्तोष मन का ही लगे,
क्योंकि सज्जन ही अभावों में पले,
वैभवों को भोगते वे ही यहाँ,
जो यहाँ सन्मार्ग पर न कभी चले॥
 
दो विरोधी भाव जग में रम रहे,
क्यों नहीं इस असद् को तुम रोकते।
जो करे इस मार्ग पर प्रेरित हमें,
तुम उसी को क्यों नहीं हो टोकते॥
 
तुम पिता इस जगत के कहते सभी,
पक्षपात नहीं किया तुमने कभी।
भूल हो अज्ञानता वश यदि कभी,
फिर क्षमा करते नहीं क्यों तुम कभी॥
 
जब तुम्हीं स्रष्टा, तुम्हीं पालक यहाँ,
और संहार कब ने तुम ही सदा ।
पाप को फिर नष्ट क्यों करते नहीं,
सुख यहाँ पाएँ सभी जन सर्वदा॥
 
बुद्धि बिन चंचल हमारा मन हुआ,
तुम विवेक हमें नहीं क्यों दे रहे।
तुम अरूप सरूप कैसे हो कहाँ,
भ्रमित हो इस विश्व में हम फिर रहे॥

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