अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

समझ न सका नियति नटी का यह दावँ-पेंच

मैं हूँ वह अभागा, जिसने देखा न कभी
अपने जीवन पटल पर सुख का सबेरा
हृदय सागर भरा रहा, अपने ही दृग जल से
पाया न किस्मत कुछ, केवल रोना पाया
अरमानों की ज्वाला बनाकर, यौवन का
मधु लोभ में निकला, कुसुक दल में गरल पाया
नियति नटी के इस खेल में, मिट गया जीवन सारा
देखा न कभीअपने जीवन पटल पर सुख का सबेरा

 

सूखी लता, मुरझे सुमन,मरुस्थल बना रहा हृद्देश
रात गई तो रात आई, जीवन रहा निरुद्देश्य
दृग बंदकर बैठा रहा कि एक दिन मेरे प्राणों को
भरने आयेगा सुनहले सपनों से भरा आलोक
सुख का वर पाने जीवन भर, नयन नीर से
अपने तन-मन को मल -मल कर धोता रहा
मगर मिटी न मेरे मुख पर की लगी कालिमा
जान न सका विधु और मेरे तकदीर का दावँ-पेंच

 

कुसुमांजलि करों में लेकर बढता, चलता रहा
शायद कहीं खुला मिला जाये, देवालय का पट
मगर अनन्त गायन की ध्वनि पर पाँव मेरे थिरक उठे
गिर गए सारे कुसुम, बचा न कुछ भी शेष
तब से आज खोज रहा हूँ, मैं उस उदगम को
जहाँ से उठती है, सुख शीतलता की पुलक भरी हिलोर
जिसके लिए दग्ध जीवन का स्वर लहराता पवन में
जिसके लिए सुरभ भरते चन्दन का रस कोष

 

मगर मिला न आज तक सुख विधु की मुसकान
विदा हो चला मैं,कुंज के अर्द्धखिले फूलों के समान
सह न सका मेरा यह जीवन, इतना बड़ा शोक
अनंत दुखों के बीच हँसते रहो, कहता यह लोक

 

कौन कहता है जिसका कोई नहीं
उसके संग होते स्वयं घनश्याम
क्या, यही टीका लगाकर करते हैं
दीन –दुखियों, निर्बलों का कल्याण
अपने प्रिय भक्त धनंजय के लिए
केशव ने क्या-क्या नहीं सहा अपमान
मेरे लिए सत्य ओझल,केवल रहा व्यवधान

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

नज़्म

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं