भारतीय साहित्य के बहुभाषी सेतु डॉ. संतोष अलेक्स
साक्षात्कार | बात-चीत डॉ. ऋतु शर्मा15 Apr 2026 (अंक: 295, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे द्वारा बहुभाषीय साहित्यकार डॉ. संतोष साक्षात्कार
शब्दों को सीमाओं से मुक्त कर भाषाओं के बीच सेतु निर्मित करने वाले कवि, आलोचक, संपादक व अनुवाद-विधा के सिद्धस्त हस्ताक्षर बहुभाषिक संवेदना के संवाहक—डॉ. संतोष अलेक्स जी का साहित्यिक अवदान अत्यंत व्यापक और प्रभावशाली है। यह साक्षात्कार केवल उनके साहित्यिक कृतित्व की चर्चा करना ही नहीं बल्कि उनके व्यक्तित्व और की उस आंतरिक साधना को समझने का भी प्रयास है, जिसने उन्हें निरंतर सृजन-पथ पर अग्रसर रखा है।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे:
संतोष जी, आपकी रचनात्मकयात्रा की शुरूआत कैसे हुई? कोई विशेष घटना, व्यक्ति प्रेरणा स्रोत रहे या कोई कविता और जिसने आपको अनुवाद की ओर उन्मुख किया?
डॉ. संतोष अलेक्स:
मैंने एम.ए. हिंदी की पढ़ाई कोचिन विश्वविद्यालय से की। एम.ए. के साथ साथ मैंने अनुवाद में डिप्लोमा कोर्स भी किया। डिप्लोमा की कक्षाएँ सुबह आठ से दस बजे तक होती थ। सो बाक़ी का पूरा दिन ख़ाली रहता था। सो एक दिन ख्याल आया कि अनुवाद की कक्षाओं में थियोरी में जो सिखाया गया है, इसका व्यावहारिक अनुवाद कैसे रहेगा, इसे थोड़ा आज़माया जाए।
सो मैंने मलयालम के चर्चित लेखकर ऐन.एस. माधवन की कहानी “तिरूत्त” का हिंदी अनुवाद किया और मेरे गुरुवर प्रो. अरविंदाक्षन जी को दिखाया। उन्होंने छोटी-छोटी कहानियों के अनुवाद करने का सुझाव दिया। तब मैंने चर्चित कहानीकार माधवीकुट्टी की कहानी का अनुवाद “बकरी” शीर्षक से किया।
कोचिन में उनके घर मिला। उनके आग्रह पर कहानी का अनुवाद भी पढ़ा जिसे उन्होंने सराहा और मुझे अनुमति पत्र भी दिया।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे:
आपकी कविताओं का विश्वभर में 32 भाषाओं में अनुवाद हुआ है—आपकी काव्य संवेदना का कौन सा तत्व वैश्विक पाठकों को सबसे अधिक जोड़ता है?
डॉ. संतोष अलेक्स:
यह मेरे सौभाग्य की बात है कि मेरी कविताओं का अनुवाद विश्व के 32 भाषाओं में हुआ है। इसमें जर्मन, फ्रेंच, मंगोलियन, इटालियन, तुर्की, अरबी, सिंहलेस, स्पेनिश एवं भारतीय भाषाएँ शामिल है। विदेशी भाषाओं का अुनवाद अंग्रेज़ी से और भारतीय भाषाओं का अनुवाद हिंदी से हुआ।
मेरी कविताओं में नदी, नाले, प्रकृति एवं मनुष्य द्रष्टव्य है। मनुष्य की ख़ुशी व पीड़ा सब जगह एक समान होता है। इसलिए यह सार्वभौमिक विषय है। यही कारण हो सकता है कि मेरी कविताओं का अनुवाद इतनी अधिक भाषाओं में हो पाया।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे:
आप एक कवि, आलोचक और अनुवादक हैं। इन तीनों में से आप सबसे अधिक किसे चुनौतीपूर्ण मानते हें? और क्यों?
डॉ. संतोष अलेक्स:
ऋतु जी, तीनों की पृष्ठभूमि अलग-अलग है। साहित्य की भिन्न विधाओं में कविता सबसे कठिन विधा है। कविता मेरे लिए स्वानुभूति है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह भोगा हुआ यथार्थ है। कल्पना के आधार पर कविता लिखने की एक सीमा होती है। कविता में कवि ने जो देखा, सुना और महसूस किया उसकी अभिव्यक्ति को शब्दबद्ध किया जाता है। यह ज़रूरी नहीं कि आप जो अनुभव कर रहे हैं यह कुछ ही दिनों में कविता का रूप ले। कभी- कभी महीनों या साल भी लग सकते हैं।
जहाँ तक आलोचना की बात है। यह कविता से बिल्कुल अलग है इस दृष्टि से कि आलोचक को बहुपठित होना चाहिए। जिस विधा की आलोचना की जा रही है उसको कई कोणों से देखने और परखने की क्षमता उसकी होनी चाहिए। कई मरतबा देखा जाता है कि आलोचना एकतरफ़ा भी जो जाता है। या तो वह लेखक के पक्ष में या फिर विपक्ष में अपनी बात को रखता है। आलोचक को चाहिए कि वह निष्प्क्ष हो। विधा का सही मूल्यांकन करें। मेरा आलोचक पक्ष केवल अनुवाद पर केंद्रित है। इसलिए मैं अनुवाद को भाषाओं के बीच परस्पर अनुवाद को और भारतीय भाषाओं के बीच और भारतीय भाषाओं से अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ी से भारतीय भाषाओं में की जानेवाले अनुवाद पर मेरा काम है।
जहाँ तक अनुवाद की बात है। मैं बहुभाषी अनुवादक हूँ। मलयालम, हिंदी, तमिल, तेलुगु एवं अंग्रेज़ी में अनुवाद करता हूँ। मलयालम, हिंदी एवं अंग्रेज़ी में परस्पर अनुवाद करता हूँ। तेलुगु एवं तमिल से लाइव अनुवाद करता हूँ या फिर अंग्रेज़ी के माध्यम से।
साहित्य सृजन है तो अनुवाद पुनसृजन है। यह मौलिक लेखने से भी कठिन होता है। अक्सर लोग यह समझते हैं कि दो भाषाओं का ज्ञान हो तो अनुवाद सम्भव है। ऐसा नहीं है।
प्रत्येक भाषा अपने साथ अपने समाज, संस्कृति एवं दर्शन का वहन करती है। भाषा अपने भावों, विचारों तथा अनुभवों के लिए जिन शब्दों का चुनाव करती है, वे संदर्भहीन नहीं होते। शब्दों के साथ उनकी दार्शनिक सांस्कृतिक विरासत जुड़ी हुई होती है। सभ्यता की शब्द रूपी अभिव्यक्ति वस्तुत: मन में स्थित भावों एवं संवेगों का अनुवाद ही है। यदि अनुवाद शब्द की इस व्यापक सत्ता को छोड़ दिया जाए और उसके एक भाषा में दूसरी भाषा में रूपांतरण वाले अर्थ को भी ग्रहण किया जए तो यह अर्थ निकलता है कि अनुवाद एक संस्कृति में दूसरी संस्कृति में अनुवाद है न कि एक भाषा में दूसरी भाषा में अनुवाद।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे:
आज अनुवाद की क्या प्रासंगिता है? भारतीय भाषाओं में परस्पर अनुवाद को आप किस रूप में देखते हैं?
डॉ. संतोष अलेक्स:
भारत के सांस्कृतिक संदर्भ में अनुवाद का सर्वाधिक महत्व है, कारण यह कि बहुभाषी देश होने के कारण भाषाओं के बीच आदान-प्रदान लाज़िमी है जो अनुवाद के माध्यम से बख़ूबी निभाया जाता है। अलग-अलग भाषाओं वाले समाज के बीच विचारों एवं अनुभवों के आदान-प्रदान के लिए अनुवाद की परंपरा पुरानी है
भारतीय भाषाओं में परस्पर अनुवाद भारत की सांस्कृतिक एकता, भाषिक विविधता को जोड़ने और राष्ट्रीय एकीकरण के लिए सहायक है। भारतीय भाषाओं में रचित साहित्य और ज्ञान विज्ञान के प्रसार में अनुवाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हमने विश्व के रचनाकारों को अनुवाद के माध्यम से ही जाना है, वरना गोर्की, दस्तायवस्की, काफका, बोरहेस, रिल्के, नेरूदा जैसे साहित्यकार अपनी भाषाओं की सीमाओं को नहीं लाँघते।
आज के इंटरनेट युग में अनुवाद की ज़रूरत बढ़ गई है। आज बैंकिंग, इतिहास, संचार माध्यम, शिक्षा, न्यायालय, धर्म और राजनीति लगभग सभी क्षेत्र में अनुवाद का सहारा लिया जा रहा है।
भिन्न भारतीय भाषाओं बोलने वालों के बीच सद्भाव बनाए रखने में अनुवाद का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आज अनुवाद एक सामाजिक आवश्यकता है। वास्तव में भारतीय भाषाओं के बीच आदान-प्रदान की कमी के कारण एक भाषा में रचित साहित्य की जानकारी दूसरी भाषा में पहुँच नहीं पाती। एक भाषा दूसरी भाषा की संस्कृति व साहित्य से अनभिज्ञ है। अनुवाद ही वह माध्यम है जिससे इस दूरी को पाटा जा सकता है।
भारतीय भाषाओं के बीच परस्पर अनुवाद करने पर कहीं पर विपरीतताएँ दिखाई देती हैं तो कहीं समानताएँ भी हैं। संस्कृत, अरबी, फारसी तथा यूरोपीय भाषाओं के तत्सम और तद्भव शब्दों के अर्थ विपर्यय को छोड़कर तथा तद्भव रूप भेद को छोड़कर काफ़ी समानता मिलती है। इसी प्रकार अनेक शब्द ऐसे होते हैं जो एक से अधिक भाषाओं में एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। सामाजिक और सांस्कृतिक समानता के कारण भारतीय भाषाओं के मुहावरों, लोकोक्तियों और प्रयोगों में भी काफ़ी समानता मिलती है। इसलिए भारतीय भाषाओं के बीच परस्पर अनुवाद में कुछ सुविधाएँ भी हैं।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे:
आपकी नई किताब ‘बारिश में भीगे आँवले के फूल’ इसके बारे में कुछ बताएँ।
डॉ. संतोष अलेक्स:
मेरी इच्छा हमेशा कुछ अलग करने की होती है। बारिश मुझे बहुत अच्छी लगती है। आपको पता होगा कि केरल में मानसून का अपना एक अलग सौंदर्य है। बारिश हमेशा साहित्यकारों का प्रिय विषय रहा है, ख़ासकर कवियों का। सो मैं भारतीय भाषाओं में लिखी गई बारिश की कविताओं को ढूँढ़ने लगा और फिर कवि मित्रों से कविताएँ माँगी। इस किताब में 14 भारतीय भाषाओं में लिखी गई बारिश कविताओं का हिंदी अनुवाद है।
मानसून का प्रभाव केवल भारतीय कृषि व्यवस्था, उद्योग और वातावरण पर ही नहीं पड़ता अपितु भारतीय लोक-साहित्य पर भी पड़ता है। मानसून आने पर केवल दादुर ही नहीं टरटराते, मोर ही नहीं नाचते बल्कि भारतीय कृषक, युवक-युवतियाँ सभी उल्लासमय होकर नाचने-गाने लगती हैं, झूमने लगती हैं।
आदि कवि वाल्मीकि कहते हैं कि—सूर्य अपनी किरणों से सागर का पानी सोख लेता है, फिर यही सागर का पानी आकाश अपने गर्भ में नौ माह रखता है और जलवर्षा के रूप में अमृतपुत्र को जन्म देता है। वे मेघमाल को ऐसी सीढ़ी कहते हैं जिन पर चढ़कर कुटज और अर्जुन की माला से सूर्य का हम अभिनन्दन कर सकते हैं। कालिदास का मेघदूत वर्षा का ही काव्य है। कालिदास ने अपने विलक्षण काव्य सामर्थ्य से वर्षा का मानवीकरण कर दिया है। कादंबरी में बाणभट्ट ने वर्षा ऋतु का भयावह वर्णन करते हुए वर्षा की बूँदों को बाणों की संज्ञा दी है। जयदेव ने अपने कालजयी ग्रन्थ गीतगोविन्द का आरम्भ ही वर्षा से किया है।
इस संकलन में हिंदी में आधुनिक काल में भारतेंदु हरीशचंद्र से लेकर विनोद कुमार शुक्ल तक की कविताएँ शामिल हैं।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे:
आप बहुभाषी अनुवादक हैं और साथ में मौलिक लेखन भी करते हैं। दोनों को आप कैसे कर पाते हैं? आपके अनुभव को साझा कीजिएगा।
डॉ. संतोष अलेक्स:
ऋतु जी मैंने शुरूआत अनुवाद से की। पहले मलयालम कहानियों का हिंदी में अनुवाद करने लगा। फिर मलयालम कविताओं का हिंदी में अनुवाद किया। कविताओं का अनुवाद करते करते मलयालम में 2008 में दूरम एवं 2013 में ज्ञान णिनेककोरू ग़ज़ल नामक काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ। इस बीच मेरी हिंदी कविताओं का प्रकाशन देश के चर्चित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ। 2013 में पाँव तले की मिट्टी एवं 2017 में हमारे बीच का मौन काव्य संग्रह प्रकाशित हुए।
2016 में अनुवाद प्रक्रिया एवं व्यावहारिकता, 2019 में हिंदी की साहित्येतर भूमिका, 2021 में अनुवाद की बहुभाषिकता प्रकाशित हुई।
जैसा मैंने पहले कहा, मेरी कोशिश हमेशा कुछ अलग करने की होती है। गाँधी जिसे मैंने जाना—इस दृष्टि से अलग है कि इस किताब में तीन खंड हैं। पहले खंड में गाँधीजी की ज़िन्दगी के तत्वों को आधार बनाकर लिखे गए आलेख हैं। दूसरे खंड में गाँधी पर बापू पर मैंने पेंसिल स्केचेस बनाए उसे शामिल किया गया है। तीसरे खंड में गाँधी पर हिंदी एवं भारतीय भाषाओं में लिखी गई कविताएँ शामिल हैं। 2021 में मेरी पहली यात्रा वृतांत ‘देवदारूओं के तले’ और 2023 में दूसरी यात्रा वृतांत ‘इस्तांबुल में हफ़्ते भर’ प्रकाशित हुई। इस बीच साहित्य अकादमी के लिए चर्चित मलयालम उपन्यासकर सेतु की उपन्यास का हिंदी अनुवाद ‘संकेत’ शीर्षक से करने का मौक़ा मिला।
कहने का तात्पर्य है कि मैं मौलिक लेखन और अनुवाद साथ-साथ कर पाया। कोई पूर्व निर्धारित योजना नहीं थी। जैसे काम आता गया मैं करता गया।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे:
आपकी यात्रा वृत्तांत की तीन किताबें हैं। ‘इस्तांबुल में हफ़्ते भर’ काफी चर्चित रहा। यह किताब कैसे सम्भव हुई। कुछ कहें।
डॉ. संतोष अलेक्स:
मेरी हिंदी कविताओं का अनुवाद तुर्की की कवयित्री श्रीमती हिलाल काराहान ने किया। 2017 में इस्तांबुल अंतरराष्ट्रीय कविता उत्सव में इसका विमोचन हुआ। मैं इस्तांबुल में हफ़्ते भर रहा। यह यात्रा वृत्तांत उस यात्रा पर आधारित है। वहाँ के लोग, उनकी वेश भूषा, खान-पान, वहाँ के दर्शनीय जगह आदि को इस किताब में शब्दबद्ध किया गया है। जहाँ तक मेरी जानकारी है हिंदी में इस्तांबुल को लेकर लिखा गया पहला यात्रा वृत्तांत है।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे:
आपने मलयालम से हिंदी में ही नहीं अपितु हिंदी से मलयालम में भी अनुवाद किया है। इस प्रकार आप उत्तर और दक्षिण के बीच सेतु का भी काम कर रहे हैं। हिंदी से मलयालम अनुवाद पर कुछ रोश्नी डालें।
डॉ. संतोष अलेक्स:
हिंदी से मलयालम में मेरी तीन किताबें है जो कविताओं की हैं। साहित्य अकादमी के लिए मैंने लीलाधर जागूड़ी जी की अकादमी पुरस्कृत किताब ‘अनुभव के आकाश में चांद’ का मलयालम में अनुवाद किया। इसके उपरांत केरल के एक प्रकाशक के अनुरोध पर ज्ञानपीठ पुरस्कृत कवि केदारनाथ सिंह की चुनिंदा कविताओं का मलयालम अनुवाद किया। हिंदी में चर्चित कवि व कवयित्रियों की कविताओं का अनुवाद किया जिसमें एकांत श्रीवास्तव, बोधिसत्व, केशव तिवारी, विलमेश त्रिपाठी, बदरीनारायण, अनिता वर्मा, नीलेश रघुवंशी आदि शामिल हैं।
इसके अलावा मैंने ‘चीफ़ की दावत’ एवं मन्नु भंडारी का ‘सयानी बुआ’ का मलयालम अनुवाद किया जो मलयालम की चर्चित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे:
संतोष जी आपकी मलयालम फ़िल्म पर एक नयी किताब आई है। इस पर कुछ बताएँ।
डॉ. संतोष अलेक्स:
जी। मैंने मलयालम के चर्चित फिल्म मेकर के.जी. जॉर्ज की महत्वपूर्ण फिल्मों पर एक किताब लिखी है जिसका शीर्षक है ‘के.जी. जॉर्ज की फिल्में ’ के.जी. जॉर्ज मलयालम सिनेमा के प्रमुख हस्ताक्षरों में से एक हैं। इनकी फिल्में समय से बहुत आगे की थीं। इनकी फिल्मों में स्त्री पात्रों को महत्व दिया गया था या यूँ कहें कि इन्हें स्त्री मन के पारखी भी कहा जा सकता है। मैंने इस किताब में उनकी प्रमुख फ़िल्मों पर चर्चा करते हुए मलयालम फ़िल्म को उनके द्वारा किए गए योगदान को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे:
शुक्रिया जी आपने हमें इतना समय दिया। आपको बहुत- बहुत शुभकामनाएँ और आगे ऐसे ही लिखते रहिए।
संतोष अलेक्स:
शुक्रिया जी।
डॉ ऋतु शर्मा ननंन पाँडे पत्रकार
लेखिका, अनुवादक, संपादक व संस्थापक व
अध्यक्ष अंतरराष्ट्रीय हिन्दी संगठन नीदरलैंड
RituS0902@gmailcom
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