कैसा जूनून?
कथा साहित्य | लघुकथा डॉ. रमा द्विवेदी1 Oct 2021 (अंक: 190, प्रथम, 2021 में प्रकाशित)
परचून की दूकान के सामने लम्बी क़तार लगी थी। उसमें एक ग्राहक मैं भी थी और अपना नंबर आने की प्रतीक्षा कर रही थी।
मुझसे आगेवाली महिला ग्राहक ने दुकानदार को सामान का पर्चा पकड़ाया।
दुकानदार पर्चा पढ़कर बोलने लगा, "10 किलो शक्कर, 10 किलो अरहर दाल, 10 किलो राजमा, 10 किलो चना, 10 किलो उड़द दाल, 10 किलो आटा," अपनी धुन में बोलता जा रहा था।
महिला ग्राहक ने उसे टोका, "100 किलो आटा है और 50 किलो चावल है।"
दुकानदार बोला, "100 किलो आटा? इतना स्टॉक मेरे यहाँ पर नहीं है, सब तुम्हें ही दे दूँगा तो जो दूसरे ज़रूरतमंद खड़े हैं उन्हें क्या दूँगा? ऐसा करो आज दस-पंद्रह किलो ले जाओ। कुछ दिन बाद फिर आकर ले जाना।"
दुकानदार का उत्तर सुनकर महिला ग्राहक भड़क कर बोली, "मुझे अभी ही चाहिए, चाहे जो भी हो जाए।"
दुकनदार ने सॉरी कहकर पर्चा देते हुए कहा, "अभी तो इतना ही मैं दे सकता हूँ, आपको चाहिए तो ले जाइये, नहीं तो कहीं और जाकर ले लीजिये।
"कृपया दूसरे ग्राहक को आने दीजिये।"
मैं सोचने लगी संचय करने का यह कैसा जूनून है?
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