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प्रेम-ज्वाला

 

क़दम रुक गए क्यों, थिरकते-थिरकते। 
कहाँ आ गए हम, बहकते-बहकते। 
 
कलियों ने हँसकर, है सौरभ लुटाया 
कहा है बहुत कुछ, महकते-महकते। 
 
कभी बाँसुरी-स्वर लुभाता हृदय को
कभी भाव विह्वल, सिसकते-सिसकते। 
 
प्रकृति की नहीं, प्रेम-ज्वाला बुझी है 
युगों हो गए हैं, दहकते-दहकते। 
 
‘जियो और जीने दो’, संदेश अनुपम 
सुनाया विहग ने, चहकते-चहकते।

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