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भावों के पाखी

कोरा -कोरा मन का कागद
सूख गये नयनों के रंग
ओ भावों के उड़ते पाखी
कब तक लौट के आओगे
            सतरंगी पाँखों से आखर
                      कब आ लिख कर जाओगे?

 

जी भर सावन बरस गया था
भीग न पाया अन्तर्मन
मौन पड़ी अन्त:स की वीणा
नयना भूल गये दर्पण
             भीगे सुर सा राग संवेदन
                      किन तारों पे गाओगे 
                                कब तक लौट के आओगे

मानस के सागर में उठती 
मृदु सुधियों की अनगिन लहरें
न जाने फिर अब तक कैसे
लगे रहे शब्दों पर पहरे
             स्वर लहरी के बन्द दरवाज़े
                      क्या तुम खोल न पाओगे
                                कब तक लौट के आओगे?

 

आ जाओ तो स्वप्न लोक में
दोनों ही भर लें उड़ान
राग -रागिनी झँकृत होगी
रंगों से होगी पहचान
             व्याकुल मन का प्रेम निवेदन
                      कब तक तुम ठुकराओगे
                                अब तो लौट के आओगे।


 

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