अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

नाउम्मीद

सप्ताह भर से पूरे मोहल्ले में दहशत थी . . .

चार लड़कियों की सड़ी-गली अधजली लाशें मिलीं थी नुक्कड़ के मकान की गुमटी से। क्षत-विक्षत देहों की कोई पहचान, कोई शिनाख़्त नहीं हो पाई थी।

कुछ महीनों से चार लड़के रहा करते थे उस मकान में किराए पर। पास-पड़ोस के लोग बस आते-जाते देखते थे उन्हें, कोई मेल-मिलाप न था। कई दिन से किसी ने उन्हें देखा न था। तेज़ दुर्गंध आने पर पड़ोसियों ने पुलिस में रपट की थी। अब समझ आया चारों लड़के फ़रार थे। बहुत खोजबीन के बाद भी कुछ पता न लगा तो पुलिस ने बची-खुची मिट्टी को भी स्वाहा कर दिया। मामले की जाँच की ख़बरें हर चैनल पर थीं। सबके अपने आकलन थे। कोई धर्म तो कोई प्रेम के कोण से देख रहा था।

उस बदनाम मकान के बाहर रौबीली मूँछ को ताव देता सिपाही आज भी खड़ा था पहरे पर। सैर से लौटते, बड़े साहब रोक न पाए अपने आप को और आगे बढ़कर बोल पड़े–

"जय हिंद सिपाही साहेब, कुछ मालूम पड़ा कि वो बदक़िस्मत कौन थीं?"

"जय हिंद साहब, नहीं, और न ही कोई उम्मीद है, हमारे देश में जान सस्ती और इज़्ज़त महँगी हुआ करती है। होंगी किसी ऊँचे खानदान की, जिनके घर से निकलने पर माँ बाप ने न खोज की होगी, न रपट लिखाई होगी, मरा समझ दो दिन उदास हो लिए होंगे शायद।"

"ऐसा क्यों कहते हो भाई?"

"यही सच्चाई है, इस समाज में लड़की अपने मन की करे तो उसे मरा ही मान लिया जाता है। वो चारों शायद इस दुर्गति से काफ़ी पहले ही मर चुकी होंगी।" 

बड़े साहब को न जाने क्या हुआ धम्म से वहीं गिर पड़े।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंधविश्वास
|

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा

स्मृति लेख

कहानी

सामाजिक आलेख

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं