अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

फागुन का दर्द!

हे कृष्ण! फागुन फिर से आया। 

शब्द मेरे प्रश्न बन 

फिर जूझने तुमसे चले हैं। 

कह सको गर आज, 

बस इतना बताना 

रंग फगुआ का क्या तुझ पर भी चढ़ा है?

 

नाम तेरा सुनके जब मेरे कपोल 

रोज़ ही फगुआ का रंग बिखेरते हैं 

तेरे गालों पर भी क्या ऐसा असर है? 

तेरा फगुआ भी क्या मेरी ही तरह है? 

 

धानी चूनर ओढ़कर फिर भोर उतरी 

सतरंगी चादर बिछाने मेरे अंगना।

लाल किरणों से धरा की रेत भी 

ऐसी सजी कि 

तेरी सब पटरानियाँ ज्यों 

लाल चूनर में सजी हैं। 

 

पर, 

साँझ जो डूबी है 

गहरी वेदना में 

रंग उसका क्या 

ये क्या तुझको पता है? 

 

सुनती हूँ तुमने किया आज़ाद,

और उद्धार भी उन देवियों का।

तुम ही हो उद्धारकर्ता, 

लो, ये मैं भी मानती हूँ। 

मेरी भी एक बात मानो 

प्रेम से अपने मुझे 

आज़ाद करके भी बता दो। 

 

फगुआ की चंचल बयारें  

आज भी मन मोहती होंगी तुम्हारा 

जानती हूँ। 

संग तेरे डोलती होंगी सभी पटरानियाँ भी 

ठीक वैसे ही कि 

जैसे डोलते थे संग मेरे 

प्रेम रंग में डूबकर 

तुम।

 

बिखरे लम्हों को 

अगर तुम जोड़ पाओ 

माप पाओ प्रेम की गहराइयों को 

तो मुझे इतना बताना। 

वेदना और प्रेम की गहराइयों में 

भेद क्या है? 

 

तुम हो अंतरज्ञ 

यह मुझको पता है 

रंग फागुन का नहीं तुमसे छिपा है।

अनगिनत पटरानियों का रंग जो तुझपर चढ़ा है। 

पर ज़रा मुझको बता दो 

रंग मेरे प्रेम का क्या है, 

और फिर वेदना का कौन सा रंग?

 

हे कृष्ण! 

फागुन फिर से आया 

कह सको गर आज, 

बस इतना बताना 

तेरा फगुआ भी क्या मेरी ही तरह है?

तेरे गालों पर भी क्या मेरा असर है? 

बस ज़रा इतना बताना।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कहानी

कविता

स्मृति लेख

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं