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प्रदूषण की लहर हरदम

विधाता छंद गीत 
(मापनी १२२२, १२२२, १२२२, १२२२) 


प्रदूषण की लहर हरदम, धमनियों में ज़हर भरती।
सड़क सुथरी नहीं मिलती, कभी सम भी नहीं मिलती॥
हमेशा शोर में जीती, कभी भी मौन ना मिलती॥
यहाँ कंकड़ वहाँ पत्थर, खुली नाली बुला लेती।
प्रदूषण की लहर हरदम, धमनियों में ज़हर भरती।


जहाँ बचपन सुखद बीता, फ़िकर का था नहीं साया।
वहाँ यौवन सपन लाया, सुगन्धित सा रहा छाया॥
वहीं प्रौढ़ा बनी काया, जरा ने रंग दिखलाया।
घटी है साँस की ताक़त, निशा आती हुई लगती॥
प्रदूषण की लहर हर दम, धमनियों में ज़हर भरती। 


भजन के बिन दिवस बीते, सुनहरे पल वृथा बीते।
सुसंगति ढूँढती हारी, वतन सारे मिले रीते ॥
हँसे जीवन यहाँ मुझ पर, जटिल माया सदा लगती।
जगत आभास सा लगता, घड़ी नव रूप ले छलती ॥
प्रदूषण की लहर हर दम, धमनियों में ज़हर भरती॥


सुधाकर रूप भर आता, पलों में ज्वार खिंच आता।
गुल्लकों चाँदनी भरता, नशे में हो पसर जाता॥
पुलक साँसों समा जाती, मधुर अहसास दे जाती।
घड़ी भर को भुला जाती, नहीं यह चैन दे पाती॥
प्रदूषण की लहर हर दम, धमनियों में ज़हर भरती।

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