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सिर पर उनकी, हमारी नज़र, हा-लातों पर

भारत पाकिस्तान के बीच के अंतर्संबंधों के पर सरकार की नज़र है जबकि भारतीय सेना के जवानों के सिरों पर पाकिस्तान की नज़र है। जवानों के सिर पर ही नहीं , उनके, किडनी, लीवर और हार्ट पर भी। संभवतः उनके कर्णधार बहुत देरी से समझे हैं कि उनके पास सिर की कमी है इसीलिए वे सिर उठाकर आते हैं और जवानों के सिर लेकर चले जाते हैं। यदि उनके पास सिर होता तो इस प्रकार जवानों का सिर लेकर न भाग जाते? शायद न उनके पास दिमाग है न कलेजा। दिमाग होता तो इतनी निम्नस्तरीय हरकत न करते और कलेजा होता तो सामने आकर लड़ते? 1971 के युद्ध में 95 हज़ार सैनिकों का आत्मसमर्पण कर उन्होंने अपने मज़बूत कलेजे का परिचय दे ही दिया है।

1971 में हम भी शायद इतने गिरे हुए नहीं थे जितने आज हैं। आज ट्रांसपेरेन्सी इन्टरनेशनल के आकलन में हम कितने नीचे आ गिरे हैं? हथियारों की खरीदी में दलाली को लेकर या स्विस बैंक में काले धन की राशि को लेकर हम स्वयं ही ज़मीन में गहरे धँसे हुए हैं, हमारा ज़मीर ही आँखें उठाने नहीं देता। शायद इसीलिए हमारी आँखें उनके सिरों तक नहीं पहुँचतीं। अतः हम उनकी लातें देखते रहते हैं। वे जो प्राणपण से भारतीय भोले-भाले लोगों के प्राण हरने पर तुले हुए हैं। भारत सरकार की निगाह में अभी उनकी यह मात्र लात चलाने की क्रिया है। लात आघात का कोटा पूरा नहीं हुआ है। इसीलिए तंद्रित अवस्था में एकाध पुराना तैयार किया हुआ, कचरे में से निकालकर साफ किया हुआ सार्वकालिक बयान ज़ारी कर देती है। यह बयान वर्षों पूर्व का तैयार किया हुआ रखा रहता है, आवश्यकता पड़ने पर अविलंब ज़ारी कर दिया जाता है। हमारी सरकार की नज़र हा-लातों पर है।

हाँ-लातों पर यानी उनके चरणों पर? भारत सरकार कभी भी उनमें से किसी के सिर पर निगाह नहीं रखती। भारत सरकार का लिखा लिखाया वही बयान कल फिर आया। वक्तव्यानुसार सिर पर उनकी निगाह नहीं है, निगाह मात्र हालातों पर है।

यदाकदा पाकिस्तान कैसी बढ़िया लात दे देता है? कितनी प्रभावी लात? दुनिया जानती है, टाँग मारने में तो वह बहुत पहले से सिद्धहस्त है। अब ज़्यादा सिर उठाने लगा है। सिर लेकर चला जाता है। कई दशकों से हम उसे देख रहे हैं। पिछले वर्षों मुंबई में ज़ोरदार आघात किया, हमारी कमर टूटते-टूटते बची। हमने कहा तुमने लात लगाई तो हमारी बात को उसने सिरे से खारिज कर दिया। आज तक वह मानने को तैयार नहीं कि उसने हमला कराया।

पिछले दिनों हैदराबाद में, फिर कश्मीर में, अपना खेल दिखा दिया। अब कहीं और हाथ दिखा देगा। हमारी निगाहें हालातों पर पूर्ववत बनी रहेंगी। अनेक निर्दोषों की जानें चली गईं। कई दुर्भाग्यशाली अभी और चपेट में आ सकते हैं। हमारी नज़र हालातों पर हमेशा रही है; भविष्य में भी रहेगी, अधिक हुआ तो हम हम कड़ा विरोध पत्र ज़ारी कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेंगे।

जब वहाँ की संसद में उन आतंकवादियों की प्रशंसा की गई जिन्होंने हमारे यहाँ विध्वंस किया तो हमारे विदेश मंत्री ने पुनःकड़ा बयान जारी कर दिया , "आप अपने देश को सँभालें, हम अपने देश को सँभाल रहे हैं।" वे इस बात से ख़ुश हैं कि वे अपने देश को सँभाल रहे हैं। इधर भी सफलतापूर्वक टाँग फँसाये हुए हैं। जब-जब हमारा देश तरक्की की राह पर जाता है वे टाँग अड़ाते, टाँग फँसा देते हैं।

वे मज़बूती से अपने पाँव जमाये हुए हैं। कितना अच्छा सीन है वे अपनी बातों पर पूर्ववत जमे रहते हैं और हम बात बात पर उखड़ते रहते हैं। शायद भारतीयों की नियति लात खाना और शीश कटाते जाना है।

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