बीती रात के सपने
काव्य साहित्य | कविता नवल किशोर कुमार3 May 2012
सूरज के निकलने से पहले,
जब अंधेरा अपना विनाश देख,
अपने हिस्से का अंतिम अंशदान दे,
रंगमंच से भागने लगता है,
और छोड़ जाता है अपने पीछे,
कभी न सुलझने वाले,
प्रश्नों के ऊँचे पहाड़,
बीती रात की रहस्यमयी बातें,
और भी बहुत कुछ,
ज्यों भूखे पेट सोये गरीबों की,
आँखों में पलते सपने,
सपने कुछ नया करने को,
सूखी रोटी की जगह
गर्म दूध और रोटी का सपना,
या फिर सत्तु और गुड़ का सपना,
कभी अर्द्धनग्न बच्चों के तन पर,
’फैन्सी कपड़” पहनाने की तमन्ना,
अपनी टूटी झोपड़ी को,
ईंट का खंडहर बनाने का सपना,
लेकिन,
काश कि रात बीतती नहीं,
उसके सपने सजीव रहते,
जैसे ज़िंदगी कायम है,
दो रोटी खाकर भी,
जैसे तैसे इस आस में,
कि कभी तो दिन बीतेगा,
और रात आएगी ही,
फिर से अपनायेगी प्रकृति उसे,
सपने फिर से जगायेंगी,
आरज़ू उसके दिल में,
कल का इंतज़ार करने के लिए,
ताकि वो फिर दिन में,
मर सके वो पूरे दिन,
मात्र झूठे सपनों के लिए।
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