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गरीबों का नया साल

बीत गया जो अब तक,
वह कोई बुरा सपना था,
हर दिन इस झाँसे में बीता,
जो भी था वह अपना था।

फिर वहीं दिन आयेंगे,
जेठ अपना लहू जलायेगा,
भूख से त्रस्त लोगों को,
पूस में पसीना आयेगा।

गरजेंगी फिर से गोलियाँ,
बेचारे फिर से मारे जायेंगे,
वही बेरहम सरकारी कुत्ते,
गरीबों की बोटिंयाँ खायेंगें।

चलो गरीबों फिर एक बार,
पुनः मिट जायें गरीबी में,
खाकर नेताओं के जूते,
खत्म हो जायें राजनीति में।

हम तो जियेंगे अपने दिन,
चाहे आत्मा करे लाख इन्कार,
मुबारक हो उनको नया साल,
जिनकी जेब में है सरकार।

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