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एक समय के बाद

 

एक समय के बाद
धीरे-धीरे थकने लगती है पृथ्वी भी
नदियाँ
अपनी पारदर्शी स्मृतियाँ खोने लगती हैं, 
पहाड़ों की छाती पर
खनन के गहरे घाव उभर आते हैं
और जंगल
जो कभी पक्षियों की भाषा में साँस लेते थे
मशीनों के शोर में
अपनी हरियाली भूलने लगते हैं। 
 
हमने विकास के नाम पर
बहुत कुछ बनाया
ऊँची इमारतें
चौड़ी सड़कें
काँच से ढँके शहर, 
लेकिन इस निर्माण के बीच
धीरे-धीरे उजड़ती रही
धरती की आत्मा। 
 
एक समय के बाद
हवा केवल हवा नहीं रह जाती
उसमें धुएँ की थकान भर जाती है
बच्चों के फेफड़ों में
कारखानों की राख उतरने लगती है
और आकाश
जो कभी बादलों का घर हुआ करता था
अब गैसों की परतों में
अपना नीला रंग खोता जाता है। 
 
मैंने देखा है
कुछ नदियाँ
मरने से पहले बहुत देर तक तड़पती हैं, 
वे सूखती नहीं अचानक
पहले उनका जल कम होता है
फिर मछलियाँ गायब होती हैं
फिर किनारों की घास पीली पड़ती है
और अंत में
मानचित्र में बची रह जाती है
सिर्फ उनकी एक रेखा। 
 
मनुष्य
अपने समय का सबसे बुद्धिमान प्राणी कहलाया
लेकिन उसने सबसे अधिक
अपने ही घर को नष्ट किया, 
हमने पेड़ों को
सिर्फ लकड़ी समझा
नदियों को
सिर्फ संसाधन
पहाड़ों को
सिर्फ पत्थरों का भंडार। 
 
और भूल गए
कि प्रकृति
कोई वस्तु नहीं होती
वह एक जीवित संबंध होती है। 
 
एक समय के बाद
ऋतुएँ भी भ्रमित हो जाती हैं
बरसात
अपने समय पर नहीं आती
सर्दियाँ
धीरे-धीरे स्मृतियों में बदलने लगती हैं
धरती का ताप
मनुष्य की अधूरी इच्छाओं की तरह
लगातार बढ़ता जाता है। 
 
मैंने छोटे बच्चों को
पेड़ों की तस्वीरें किताबों में देखते हुए पाया है
जैसे आने वाले समय में
जंगल
सिर्फ पाठ्यक्रम का हिस्सा रह जाएँगे 
और यह कितना भयावह है
कि आने वाली पीढ़ियाँ
शायद चिड़ियों की असली आवाज़ नहीं
सिर्फ मोबाइल की रिकॉर्डिंग सुनेंगी। 
 
समुद्र
धीरे-धीरे किनारों की ओर बढ़ रहा है
हिमखंड
अपनी अंतिम श्वासों में पिघल रहे हैं
धरती
लगातार बुखार में तपती देह की तरह
काँप रही है भीतर से
लेकिन सबसे बड़ा संकट
सिर्फ पर्यावरण का नहीं है
सबसे बड़ा संकट
मनुष्य के भीतर मरती हुई संवेदनाओं का है। 
 
क्योंकि जब आदमी
एक पेड़ कटते देखकर भी
चुप रह जाता है
तब केवल जंगल नहीं उजड़ते
मनुष्यता भी थोड़ी कम हो जाती है। 
 
मैं सोचती हूँ
क्या आने वाले समय में
हम अपने बच्चों की आँखों में देख पाएँगे
जब वे पूछेंगे 
“अगर तुम्हें पता था
कि पृथ्वी बीमार हो रही है
तो तुमने उसे बचाया क्यों नहीं?”
 
स्मृतियाँ केवल मनुष्यों की नहीं होतीं
धरती भी याद रखती है
अपने जंगल
अपनी नदियाँ
अपनी नमी
अपना संतुलन
और शायद
वह हमें भी याद रखेगी
उस पीढ़ी की तरह
जिसने सुविधा के लिए
भविष्य को गिरवी रख दिया था। 
 
फिर भी
अब भी समय पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है
अब भी
किसी बच्चे के हाथ में लगाया गया पौधा
एक नई शुरुआत हो सकती है। 
 
अब भी
सूखी धरती पर गिरती पहली बारिश
उम्मीद की तरह लगती है
मैं चाहती हूँ
मनुष्य फिर से सीख सके
प्रकृति के साथ रहना
न कि उसके विरुद्ध
ताकि जब पृथ्वी
अपने लंबे इतिहास को पीछे मुड़कर देखे
तो उसे यह न लगे
कि सबसे बड़ा विनाश
उसने स्वयं मनुष्य को जन्म देकर किया था। 
 
और तब
शायद किसी सुबह
हवा फिर से स्वच्छ होगी
नदियाँ अपने पुराने गीत गाएँगी
पेड़ फिर भर देंगे आकाश में हरियाली
और मनुष्य
पहली बार सचमुच समझ पाएगा
कि पृथ्वी केवल रहने की जगह नहीं थी
वह हमारी माँ थी
जिसकी साँसों पर ही
हमारी पूरी सभ्यता टिकी हुई थी।

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