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वह जब बोलती है

 

वे चाहते हैं
स्त्री नदी बनी रहे
बहती रहे
हर पत्थर को चूमती हुई, 
हर विष को
अपने भीतर घोलती हुई। 
 
वे चाहते हैं
उसकी आँखों में
प्रश्न नहीं, 
केवल पानी हो। 
 
उसकी देह पर
समय के नीले निशान
घर की मर्यादा कहलाएँ, 
उसकी चुप्पी
संस्कार। 
 
वह वर्षों तक
अपनी ही आवाज़
आटे में गूँधती रही, 
धुँए में उड़ाती रही, 
बच्चों की नींद में
छिपाती रही अपना रोना। 
 
फिर एक दिन
उसने अपने भीतर
बचाकर रखी हुई
आख़िरी रोशनी से कहा
अब मैं मौन नहीं रहूँगी। 
 
इतना कहना था
कि सभ्यता के चेहरे से
रंग उतरने लगे। 
 
जिन हाथों ने
उसे धकेला था अँधेरों में, 
वे ही हाथ
उसके चरित्र पर
स्याही मलने लगे। 
 
बाज़ार ने
उसके दर्द की क़ीमत लगाई, 
और सोशल मीडिया ने
उसके सत्य को
हैशटैगों में बाँट दिया। 
 
उसकी पीड़ा से अधिक
लोगों को
उसकी तस्वीरों में रुचि थी, 
उसके घावों से अधिक
उसकी हँसी पर बहस थी। 
 
कैसा समय है यह
जहाँ अपराध से पहले
स्त्री की प्रतिष्ठा कटघरे में खड़ी होती है। 
 
वे भूल जाते हैं
बार-बार दबाई गई धरती
एक दिन भूकंप बनती है। 
 
बार-बार रोकी गई नदी
एक दिन बाँध तोड़ देती है। 
और स्त्री
वह भी
सिर्फ़ सहने के लिए नहीं जन्मी। 
 
वह जब उठती है, 
तो अकेली नहीं उठती
उसके साथ उठती हैं
अनगिनत चुप्पियाँ, 
अनगिनत अस्वीकार, 
अनगिनत सदियों की राख में
दबी हुई चिंगारियाँ। 
 
तब बदनाम होना
पराजय नहीं होता। 
वह उस सत्य की क़ीमत होता है
जिसे झूठ का समाज
कभी सहज स्वीकार नहीं करता। 

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