अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य तकनीकी

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

प्रेम शायद ऐसा ही होता है

 

किसी के जीवन में
शोर की तरह नहीं, 
धीरे-धीरे उतरती हुई शाम की तरह आना। 
 
बिना कहे समझ लेना
कि सामने वाला थका हुआ है, 
और उसके पास बैठ जाना
बिना किसी सलाह, बिना किसी प्रश्न के। 
 
प्रेम बड़े वादों में नहीं रहता, 
वह छिपा होता है
चाय के उस आख़िरी घूँट में
जो कोई आपके लिए बचाकर रख देता है, 
या भीड़ भरी सड़क पर
आपकी चाल के अनुसार
अपने क़दम धीमे कर लेने में। 
 
प्रेम वह नहीं
जो हर समय शब्दों में दिखाई दे, 
कई बार वह
रसोई से आती हुई पुकार में होता है, 
देर रात भेजे गए एक छोटे-से संदेश में, 
या उस चिंता में
 
जो पूछती है
“घर पहुँच गए?” 
कभी-कभी प्रेम
पतझड़ की सूनी डाल पर रखे
फूलों से भरे एक लिफ़ाफ़े जैसा होता है, 
जो यह विश्वास दिलाता है
कि दुनियाँ चाहे जितनी कठोर हो जाए, 
कोमलता अब भी बची हुई है। 
 
प्रेम किसी को बदल देना नहीं, 
बल्कि उसके सारे अधूरेपन के साथ
उसे स्वीकार कर लेना है। 
उसकी कमियों के बीच
उसके अच्छे हिस्सों को बचाए रखना है। 
 
और शायद प्रेम का सबसे सुंदर रूप
यही है कि
कोई आपके जीवन में हो
जिसके सामने
आपको मज़बूत होने का अभिनय न करना पड़े। 
 
जिसके पास बैठकर
आप अपनी थकान उतार सकें, 
अपनी चुप्पियाँ रख सकें, 
और बिना किसी डर के कह सकें
“आज मन ठीक नहीं है।”
 
प्रेम का अर्थ
हमेशा साथ रह जाना भी नहीं होता, 
कभी-कभी यह किसी की स्मृतियों में
सम्मानपूर्वक बने रहना भी होता है। 
 
फिर भी, 
यदि जीवन की लंबी यात्रा में
कोई ऐसा मिल जाए
जिसकी उपस्थिति से
दिन थोड़ा आसान लगने लगे, 
और अनुपस्थिति में
साँझ कुछ अधिक ख़ाली, 
तो समझ लेना
 
प्रेम किसी उत्सव की तरह नहीं आया, 
वह धीरे-धीरे
तुम्हारी आदतों में उतर गया है, 
तुम्हारी प्रार्थनाओं में शामिल हो गया है, 
और तुम्हारे भीतर
एक शांत, स्थिर जगह बना चुका है, 
जहाँ लौटकर
मन को घर जैसा लगता है। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

 क़लम घिसाई
|

मैं क़लम-घिसाई करता हूँ ख़्वाबों की बुनाई…

 कुलक्षिणी
|

पैदा हुई तो दादी बोली जन्मी आज कुलक्षिणी…

 जयंती या पुण्य तिथि
|

रात सूरज जनेगी देख लेना सुबह सुबह तुम, उपेक्षा…

 तैर रहे हैं गाँव
|

धारा उपर  तैर रहे हैं  सब खादर…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

हास्य-व्यंग्य कविता

कविता - हाइकु

सामाजिक आलेख

लघुकथा

कहानी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं