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स्त्री एक कहानी

 

स्त्री वह हस्ताक्षर है, 
जिसके हृदय में इतना विस्तृत संसार दफ़न है 
जो एक नया संसार निर्मित करने की क्षमता रखता है॥
 
स्त्री ही वह बहस है, 
जो अदालतों तक मुद्दा बनती है पर 
उसकी अनकही कहानी ही सबकी ज़ुबाँ बंद कर देती है॥
 
स्त्री हर दास्तां कि वह कहानी है, 
जो सबको पढ़ लेती है पर 
उसके हृदय की दास्तां के क़रीब 
जाने में स्वयं ख़ौफ़ को भी ख़ौफ़ आता है॥
 
स्त्री मज़बूत कंधों का हौसला भी बनी है, 
दस्तक और आवाज़ उसके कानों तक आती है
रूह को तो वह स्वयं भी ख़ामोश कर देती है॥
 
स्त्री को धोने की सैंकड़ों दरियाओं ने कोशिश की, 
पर कई बार ऐसा हुआ दरिया भी 
मुँह की खाकर समुद्र में मिला है॥
 
स्त्री को तो हौसला चाहिए भी नहीं, 
क्योंकि वह ख़ुद हौसलों को हौसला देती नज़र आती है॥
 
स्त्री को काम ने कभी थकाया नहीं, 
उसको थकाया इस 
ज़बान ने कि “आख़िर तुम करती ही क्या हो?” 
 
लोगों ने भूल की यह समझकर, 
कि वह बिखर गई पर भूल गये 
अभी तो वह आँखों से संसार जलाने की 
हिम्मत रखती है॥

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