नेताजी कहिन!
कथा साहित्य | लघुकथा मनोज शर्मा15 Jun 2022 (अंक: 207, द्वितीय, 2022 में प्रकाशित)
सुबह आँख मलते हुए नेता जी उठे। अचानक उन्हेंं याद आया कि आज तो महिला दिवस है उन्होंने अपनी धर्मपत्नी को बुलाकर उसकी ठोड़ी को सहलाते हुए बोले, “लक्ष्मी हैप्पी महिला दिवस!”
लक्ष्मी पति के आतुर नयनों और प्रेम भरे बोल को सुनकर पहले तो हतप्रभ हुई पर फिर मन ही मन चहक गयी।
नेता जी गुनगुनाते हुए नहाये और फिर धौल-पोश होकर काम को चल दिये। आज उन्हें महिला दिवस पर काफ़ी सभाओं में अपने विचार रखने थे।
पहले गाँव के प्राथमिक विद्यालय में 'नारी हमारी जननी है, नारी ही हमारी शक्ति है' फिर ग्राम सभा में 'नारी हमारी माता है'! महापरिषद में 'नारी के बिना सब तुच्छ है', खेल परिषद में, ”नारी देश की आत्मा है’, 'नारी सर्वदा पूज्यनीय है' नारी संसार . . .! नारी पर दिन भर बोल बोलकर नेता जी की कमर दुखने लग गयी और यहाँ तक कि गला भी बैठ गया। उन्होंने थक हारकर क़रीब सात बजे मदिरा पान करके घर की ओर रुख़ किया।
सुबह के प्रेम भरे आचरण से लक्ष्मी बहुत प्रसन्न थी और नेता जी को देखकर उसकी आँखेंं खिल गयी।
“आप क्या लेंगे कुछ पकवान आदि की व्यवस्था कर दूँ आपके लिए?”
मदिरा पान से नेता जी के बोल अब तक बिगड़ चुके थे जिसके कारण लक्ष्मी अब दुश्मन नज़र आने लगी थी।
“कलमुही निकल जा यहाँ से आते ही मेरी जान खाने लगी कुलटा कहीं की!” ग़ुस्से में लाल आँखेंं दिखाते हुए नेता जी लक्ष्मी पर बरस पड़े।”औरतें साली निर्लज्ज हैं, हर काम में रुकावट डालती हैं, अनपढ़, गँवार, कुलछनी कहीं की, दूर हो जा मेरी आँखों के सामने से,” लक्ष्मी को बोलते हुए सोफ़े पर लुढ़क गये।
मर्द सब एक से होते हैं विस्मय भरी आँखों से लक्ष्मी नेता जी के बदलाव को देखती रही!
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