रिक्शावाला
कथा साहित्य | लघुकथा मनोज शर्मा1 Apr 2022 (अंक: 202, प्रथम, 2022 में प्रकाशित)
बस स्टॉप पर आज इतनी भीड़ थी कि पाँव रखने तक की जगह नहीं थी। हर बस जो भी सामने से गुज़रती इतनी भरी हुई कि उसमें चाह कर भी नहीं चढ़ा जा सकता था। मैं किताबों से भरे थैले को थामे हर बस को उद्विग्नता से देखता और निराशा से क्षितिज को देखने लगता। तीन बसें मेरी पहुँच से बाहर जाती रहीं चौथी बस का हैन्डल जैसे-तैसे मैंने लपक लिया और लटक गया। किसी तरह धक्के खाता बस मैं भीड़ से भरी बस के अन्दर निकल आया। मैं अपने साथ किताबों से भरा थैला ना पाकर घबरा गया।
“मेरा थैला कहा है?”
मैं इधर उधर देखता रहा हर तरफ़ शोर फैल गया।
“अरे इस बेचारे का सामान से भरा थैला कहीं छूट गया।”
“क्या था महोदय उसमें?”
“कुछ क़ीमती सामान था क्या?” किसी ने भीड़ में से पूछा।
हर कोने में अफ़रा-तफ़री मच गयी। सबकी नज़रें अब मुझ पर थीं।
मैं कंडक्टर से बस रोकने की मिन्नतें करने लगा कि मेरा थैला वहीं स्टॉप पर छूट गया है जहाँ से मैं अभी चढ़ा हूँ। पहले तो बस कंडक्टर ने मुझे विस्मय और ग़ुस्से से देखा पर फिर मेरे फीके घबराए चेहरे की ओर देखकर उसने बस रोकने को निर्देश दिया। बीच सड़क पर बस मुझे उतारकर आगे बढ़ गयी। मैं हवा में उड़ते काले धुँए को पलभर गहराई से देखता रहा। किताबों से भरे थैले को ना पाकर मेरा दिल तेज़-तेज़ धड़कने लगा मुझे उसे आज बुक शॉप पर पहुँचाना था। मैं मायूस होकर एक पेड़ की घनी छाँव में बैठ गया। तेज़ गर्मी के कारण मेरा माथा बिलकुल भीग चुका था। सहसा मेरी नज़र उस रिक्शा पर पड़ी जो मेरी ही तरफ़ बढ़ती चली आ रही थी। मैंने पेशानी को पोंछते हुए उस रिक्शा वाले को देखा घूमता पहिया अब थम चुका था। उसके चेहरे पर नर्म हँसी थी और आँखेंं ख़ुशी से चमक रही थी। उसने मुस्कुराते हुए रिक्शा से किताबों से भरा थैला उठाते हुए मुझे थमा दिया और कहा, “भैया जी मैं जानता हूँ इस थैले में कितने बच्चो का भविष्य है इसलिए जैसे ही आप बस में बिना बैग के चढ़े मैं आपका पीछा करता रहा। अच्छा रहा आप ज़्यादा दूर तक नहीं निकले थे नहीं तो मेरे लिए आपको खोजना और भी कठिन हो जाता।”
मैंने उसे पाँच सो रुपये का नोट थमाना चाहा पर उसने मुस्कुराते हुए उसे नहीं लिया। उसकी ईमानदारी देखकर मेरी आँखेंं नम हो गयीं। उसने मुस्कुराते हुए अपनी रिक्शा मोड़ी और हवा में अपने हाथ हिलाता हुआ लौट गया।
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