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विश्वास

 

सुधा आलमारी और बॉक्स का सारा सामान फैलाकर न जाने क्या ढूँढ़ रही थी। बहुत बेचैन और परेशान-सी, बदहवास, बस कभी यहाँ तो कहीं वहाँ सामान को फैलाए जा रही थी।

“क्या ढूँढ़ रही हैं मम्मी?” चारु ने पूछा।

“वो जो रवि के शादी में चाँदी का पान सुपारी और कलश तिलक पर चढ़ा था वो नहीं दिख रहा; आख़िर कहाँ गया? यहीं तो रखा था, अब मिल नहीं रहा। शायद किसी ने चुरा लिया है। चंदा की शादी के लिए सामान भी यहीं इकट्ठा करके दिया था। क्या पता वहाँ चला गया हो? तुम्हारी बुआ तो वैसे भी नहीं बताएँगी।”

चारु सोच रही थी आज बुआ के लिए मम्मी बोली—कल ऐसा ही मेरे साथ होगा।

उदास-सी बोली, “माँ एक बार भाभी से पूछ लीजिए शायद उन्होंने रख दिया होगा।”

“ऐसे कैसे पूछ लें? वो मैंने रखा था, कहेगी सासू माँ चोरी लगा रही हैं।”

तभी फोन की घंटी बजी; नीरू का फोन था, चारु ने कहा, “भाभी हैं आप पूछ लीजिए उनसे एक बार।”

“ठीक है फोन लाओ। नीरू वो जो तुम्हारे शादी का पान सुपारी और कलश था वो कहाँ है तुम्हें पता है?”

“हाँ मम्मी जी मैंने देखा था, आपने बक्से में रखा था। वो सब मेरा था, मैंने रख लिया।”

चारु सुधा का मुँह देखती रह गई थी। 

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